आधुनिक “जन” मीडिया का उद्भव और विकास, पूँजीपति वर्ग का वर्चस्व और एक क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया की ज़रूरत

अभिनव सिन्हा

इतालवी कम्युनिस्ट अन्तोनियो ग्राम्शी ने बताया था कि पूँजीपति वर्ग वर्ग समाज के इतिहास में पहला ऐसा वर्ग है, ज़िसका शासन किसी एकतरफ़ा प्रभुत्व पर निर्भर नहीं करता है। यह पहला शोषक वर्ग है जो अपने शासन का वैधीकरण ईश्वर, धर्म या किसी भी आदिम या प्राक्-आधुनिक संस्था या सत्ता से नहीं प्राप्त करता है। पूँजीवाद के उदय से पहले जो प्राक्-पूँजीवादी व्यवस्थाएँ थीं, वे एकतरफ़ा और पूर्ण प्रभुत्व पर आधारित थीं। यही कारण था कि वे अन्दर से ज़्यादा कमज़ोर थीं, और बुर्जुआ क्रान्तियों द्वारा उनके ध्वंस की प्रक्रिया, ग्यॉर्गी लूकाच के शब्दों में, उत्कृष्ट रूप से मनोहर ढंग (विद ब्रिलियण्ट इलान) से आगे बढ़ी। सामन्ती शासक वर्ग अपनी सत्ता के वैधीकरण के लिए चर्च और धर्म पर निर्भर करता था। उसका शासन प्रत्यक्ष और नग्न प्रभुत्व पर निर्भर करता था, और जनता के बीच मौजूद पिछड़ी धार्मिक चेतना की सशक्त उपस्थिति के कारण, धर्म और चर्च से इसके लिए वैधता प्राप्त करना तुलनात्मक रूप से सहज था। यही कारण था कि लगभग सभी समाजों में प्राक्-पूँजीवादी शासन व्यवस्थाएँ निकटता के साथ धार्मिक अधिरचना से जुड़ी रही हैं। कई जगह तो इनके बीच का संलयन इस किस्म का था कि राज्यसत्ता और धार्मिक संस्थाओं के बीच फर्क करना भी मुश्किल था। दिव्य रूप से प्रदत्त अधिकार से सामन्ती शासक वर्ग शासन करता था। राजा ईश्वर की छाया था, और वह जो बोलता था वह कानून होता था। अलग-अलग देशों में इस पूरी प्रणाली के काम करने की पद्धति में कई अन्तर मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर, यूरोप में यह प्रक्रिया एक अलग तरीके से घटित होती थी, जबकि भारतीय समाज में इसका स्वरूप काफ़ी भिन्न था। लेकिन गुणात्मक रूप से मूल तर्क समान था। प्राक्-पूँजीवादी व्यवस्थाओं में शासक वर्ग को अपने शासन को जारी रखने के लिए धार्मिक वैधीकरण प्राप्त था और उसका शासन लगभग पूर्ण और एकतरफ़ा प्रभुत्व पर आधारित था।

ऐसा नहीं था कि इस एकतरफ़ा प्रभुत्व के विरुद्ध समाज में प्रतिरोध के स्वर नहीं मौजूद थे। एक ओर किसान विद्रोहों ने सामन्ती (या प्राक्-पूँजीवादी) समाजों की बुनियाद को हिला कर रख दिया था, तो वहीं दूसरी तरफ़ उभरता हुआ बुर्जुआ वर्ग भी अपनी बढ़ती आर्थिक शक्तिमत्ता के साथ-साथ अपने आपको राजनीतिक रूप से ज़्यादा से ज़्यादा संगठित कर रहा था। इस बुर्जुआ वर्ग में एक हिस्सा मध्यकालीन व्यापारियों का था जो एक क्रमिक प्रक्रिया में उत्पादन को संचालित करने लगे थे, और सिर्फ पैदा माल के विपणन में नहीं लगे थे (ज़िसे मार्क्स ने ‘ऊपर से पूँजीवाद’ की संज्ञा दी थी); जो दस्तकार उनके लिए उत्पादन करते थे, वे क्रमिक प्रक्रिया में उनके मज़दूर बन गये थे, और अब उत्पादन के निर्णयों में उनकी कोई स्वायत्तता नहीं बची थी। इस मामले में उत्पादक वर्ग का सर्वहाराकरण होने की प्रक्रिया अस्पष्ट, क्रमिक और अपूर्ण रूप से पूरी हुई। इसीलिए मार्क्स ने इसे ‘वाकई क्रान्तिकारी रास्ता’ नहीं कहा था। दूसरा रास्ता, ज़िसे मार्क्स ने ‘नीचे से पूँजीवाद’ के उदय का रास्ता बताया, दस्तकारों के बीच से ही बुर्जुआ वर्ग के पैदा होने की बात करता था। दस्तकारों के वर्ग में से कुछ दस्तकार समृद्ध होकर उजरती श्रम का दोहन शुरू कर देते हैं। जो दस्तकार बाज़ार की प्रतिस्पर्द्धा में किसी भी कारण से तबाह हो गये थे, कई बार वे स्वयं समृद्ध दस्तकारों के वर्कशॉपों में काम करते थे। यहीं से वह आबादी पैदा हुई जो एक दीर्घकालिक क्रमिक प्रक्रिया बुर्जुआ वर्ग के निर्माण का दूसरा स्रोत बनी। कहीं पर पहली प्रक्रिया बुर्जुआ वर्ग के उभार में ज़्यादा ज़िम्मेदार थी (जैसे कि इटली) तो कहीं दूसरी प्रक्रिया (जैसे कि ब्रिटेन, फ्रांस आदि)। यह नवोदित बुर्जुआ वर्ग अकेले अपने बूते पर सामन्ती शासक वर्ग से नहीं टकरा सकता था। वह इस बात के लिए मजबूर था कि वह किसानों, मज़दूरों और मध्य वर्गों को अपने साथ ले। और इन्हीं वर्गों को साथ लेने के लिए बुर्जुआ वर्ग ने अपने शासन को जनवादी शासन के तौर पर पेश किया जो कि ‘स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व’ की बात करता था। जैसा कि एंगेल्स ने ‘समाजवादः काल्पनिक और वैज्ञानिक’ में लिखा है, बुर्जुआ वर्ग का शासन स्थापित होने के बाद कुछ समय में यह पता चल गया कि बुर्जुआ वर्ग जब स्वतन्त्रता की बात कर रहा था, तो उसका अर्थ उसके लिए मुनाफ़ा कमाने की स्वतन्त्रता और मज़दूरों के लिए अपनी श्रमशक्ति बेचने और उत्पादन के साधनों के मालिकाने से स्वतन्त्रता से था और जब वह समानता की बात कर रहा था तो उसका अर्थ बुर्जुआ कानून के समक्ष औपचारिक समानता से था। निश्चित तौर पर, प्रबोधन के महान दार्शनिकों ने किसी षड्यन्त्र के तौर पर स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व के बुर्जुआ सिद्धान्त की रचना नहीं की थी, और न ही उन्होंने सोच-समझकर साज़िशाना तौर पर बुर्जुआ जनवाद को नैसर्गिक व्यवस्था का नाम दिया था। वे वाकई मानते थे कि बुर्जुआ व्यवस्था जनता को स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व मुहैया करायेगी। यहाँ तक कि क्रान्तिकारी बुर्जुआ वर्ग का एक हिस्सा भी इस नारे को शाब्दिक तौर पर लागू करना चाहता था, जैसा कि फ्रांस में जैकोबिनों के आतंक के राज्य के दौरान दिखा। बुर्जुआ प्रबोधन के दार्शनिकों का बुद्धिवाद और भाववाद पुनरावलोकन पर ही समझा जा सकता है। वे अपने युग के क्रान्तिकारी दार्शनिक थे, ज़िन्होंने अपने युग के मानसिक, दार्शनिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षितिज को विस्तारित किया। लेकिन वे अपने युग की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकते थे। मनुष्य उन्हीं सवालों को अपने सामने रखता है, जिनके समाधान की पूर्वशर्तें तैयार होनी शुरू हो गयी हों, जैसा कि मार्क्स ने कहा।

बुर्जुआ वर्ग ने किसानों, मज़दूरों और मध्य वर्ग के साथ संश्रय बनाकर बुर्जुआ क्रान्तियों को अंजाम दिया। उसने अपने शासन को प्रकृति के नियमों के अनुरूप और स्वाभाविक बताया। उसने अपने कानून को नैसर्गिक कानून करार दिया। उसने जनवाद, स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व का वायदा किया। बुर्जुआ वर्ग का यह दावा ही उसके शासन के रूप, यानी बुर्जुआ जनवाद का आधार है। आज भी जबकि यह दावा एकदम अनावृत्त हो चुका है और काफी हद तक इसकी सच्चाई जनसमुदायों के सामने है, तो भी बुर्जुआ वर्ग अपने शासन को जारी रखने के लिए अपने इसी दावे को पुष्ट करने का प्रयास करता है। ग्राम्शी ने इसी को अपने शब्दों में स्पष्ट किया और बताया कि बुर्जुआ वर्ग का शासन एकतरफ़ा प्रभुत्व पर आधारित नहीं होता। यह वास्तव में प्रभुत्व के साथ जनता के एक हिस्से को अपने शासन में सहयोज़ित करता है; बुर्जुआ वर्ग शासन करता है लेकिन साथ-साथ वह जनता से औपचारिक तौर पर ‘सहमति’ लेकर शासन करता है। इसी को ग्राम्शी ने वर्चस्व का नाम दिया।

वर्चस्व की प्रणाली में जो चीज़ सबसे महत्वपूर्ण है वह है जनता के बीच बुर्जुआ वर्ग के शासन के लिए एक ‘सहमति’ का निर्माण करना और उसके एक हिस्से को सहयोज़ित करना। बुर्जुआ जनवाद का पूरा राजनीतिक रूप और ढाँचा, यानी कि प्रातिनिधिक जनवाद, इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए बना हुआ है। संसद स्वयं एक प्रकार से जनता के एक हिस्से को सहयोज़ित करती है और बुर्जुआ वर्ग के शासन के लिए ‘सहमति’ का निर्माण करती है। लेकिन निश्चित तौर पर संसद यह काम पूरी तरह से स्वतन्त्र और स्वायत्त रूप से नहीं कर सकती है। इसके लिए किसी ऐसे उपकरण की ज़रूरत होगी, जो कि समाज के भीतर शासक वर्गों के विचारों का वर्चस्व स्थापित करे। पूँजीवादी मीडिया इसी उपकरण की भूमिका निभाता है। हमने किसी सामन्ती मीडिया की बात नहीं सुनी, क्योंकि ऐसा कोई मीडिया कभी था नहीं। सामन्त वर्ग को अपने शासन के लिए वर्चस्व की प्रणाली की ज़रूरत नहीं थी। वह दिव्य रूप वैध था। और इस वैधता के लिए स्वीकार्यता अर्जित करने के लिए उसे धार्मिक संस्थाओं से ज़्यादा किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन बुर्जुआ वर्ग के ‘सेक्युलर’ शासन को किसी अन्य दुनिया से वैधीकरण हासिल नहीं है। उसका तो दावा ही यही है कि वह जनवादी है, जनता की आकांक्षाओं की नुमाइन्दगी करता है और स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व का नारा देता है। लेकिन चूँकि वास्तव में, इन सभी आवाहनों और जुमलों के बावजूद बुर्जुआ वर्ग का शासन पूँजी की तानाशाही ही होती है, इसलिए उसे ऐसे वर्चस्वकारी उपकरणों की ज़रूरत पड़ती है, जो जनता के बीच एक छद्म चेतना का निर्माण करे, उसे यह यक़ीन दिलाये कि बुर्जुआ शासन उसी के द्वारा चुना गया है, यह उसी की सेवा करता है, और पूँजीवादी समाज की बुराइयों को वह अनिवार्य बुराइयों के तौर पर देखे, नैसर्गिक माने और उसके लिए व्यवस्था को ज़िम्मेदार न माने। यह पूरा काम करने के लिए संसद, नौकरशाही, न्यायपालिका तो लगातार सक्रिय रहते ही हैं, लेकिन राज्यसत्ता के इन तीनों निकायों के अलावा उन्हें किसी ऐसे निकाय की ज़रूरत होती है जो कि समाज में ज़मीनी आधार पर स्वायत्त दिखते हुए बुर्जुआ वर्ग के पक्ष में राय तैयार करने का काम करे। यही कारण है कि मीडिया की कथित स्वायत्तता, स्वतन्त्रता और निष्पक्षता पर बुर्जुआ वर्ग इतना ज़ोर देता है; यह एक दीगर बात है उसका यह दावा अब काफ़ी हद तक निष्प्रभावी बन चुका है, क्योंकि जनता का भी एक अच्छा.ख़ासा हिस्सा यह समझने लगा है कि मीडिया निष्पक्ष नहीं होता। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि बुर्जुआ मीडिया स्वयं अपनी यह आत्मालोचना करता है! यह एक बार नये सिरे से बुर्जुआ मीडिया की निष्पक्षता, उसकी सुधारणीयता और उसकी आत्मालोचना करने की क्षमता पर जनता के बीच भरोसा पैदा करता है। कह सकते हैं कि बुर्जुआ मीडिया आज न सिर्फ बुर्जुआ वर्ग के वर्चस्व को स्थापित करने का काम कर रहा है, बल्कि उसके लिए एक कार्यभार यह भी हो गया है कि वह स्वयं अपनी प्रणाली के वर्चस्व को कायम रखे। नतीजतन, मीडिया द्वारा सहमति निर्माण और वर्चस्व स्थापित करने की पूरी प्रक्रिया आज बहुसंस्तरीय बन चुकी है। अगर आपके पास एक स्पष्ट वर्ग दृष्टिकोण न हो, एक सही विचारधारात्मक धुरी न हो तो आप स्वयं इस वर्चस्व के अधीन आ सकते हैं। हम कई मार्क्सवादियों को भी मीडिया के वर्ग चरित्र का ज़िक्र आते ही चिड़चिड़ाते हुए देखते हैं, जो कहते हैं कि यह पुराना पारम्परिक मार्क्सवादी दृष्टिकोण आज के मीडिया पर लागू नहीं होता और यह वर्ग अपचयनवादी है और आज के मीडिया की बारीकियों को नहीं समझता है। लेकिन यहाँ ऐसे तमाम मार्क्सवादी मूल बिन्दु ही नहीं पकड़ पा रहे हैं। वास्तव में, आज मीडिया के वर्चस्व के पूरे उपकरण की संश्लिष्ट जटिलता में उनकी आलोचनात्मक दृष्टि खो जाती है। बुर्जुआ शासन और बुर्जुआ मीडिया का वर्चस्व उतना ही गहरा माना जायेगा, ज़ितना कि यह अपने विरोध को सहयोज़ित कर लेगा; ज़ितना कि यह स्वयं अपनी “आलोचना” कर सकेगा और ज़ितना अधिक यह अपने आपको वैविध्यपूर्ण और हेटरोजीनियस दिखला पायेगा। कई बार तो यह मीडिया अपना कोई विरोध न मौजूद होने पर एक (सुपाच्य) विरोध को स्वयं पैदा करता है! लेकिन यह वैविध्यता और हेटरोजीनाइटी उसके वर्ग चरित्र, उसकी राजनीति और विचारधारा में नहीं है। उसकी स्पष्ट विचारधारा और राजनीति है ज़िसका वर्ग चरित्र बुर्जुआ है। वैविध्य उसके रूप और प्रस्तुतिकरण में है और यह वैविध्य इतना जटिल और विराट है, कि कई मार्क्सवादी विश्लेषक भी उसमें खो जाते हैं, और अपनी विचारधारात्मक धुरी से भटक जाते हैं। इसलिए मीडिया के विश्लेषण और अध्ययन में सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि इस वर्ग चरित्र क्या है और यह किनके हितों की नुमाइन्दगी करता है और यह किस वर्ग के विचारधारात्मक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वर्चस्व के निर्माण का उपकरण है।

जैसा कि हमने बताया कि मीडिया के विश्लेषण और अध्ययन का प्रश्न भी पूँजीवाद के विकास के साथ ही पैदा हुआ। सामन्ती शासक वर्ग को किसी मास मीडिया की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन पूँजीवाद को इसकी ज़रूरत थी। अखबारों और पर्चों की संस्कृति का विकास ही मूलतः बुर्जुआज़ी के आन्दोलन के साथ हुआ। बाद में, इनका इस्तेमाल बुर्जुआ वर्ग ने अपने शासन को जारी रखने में भी करना शुरू कर दिया। संचार (कम्युनिकेशन) के सामाज़िक ढाँचों पर दार्शनिकों की कुछ टिप्पणियाँ तो हमें प्राचीन काल में भी मिल जाती हैं, लेकिन पूँजीवादी मीडिया के उदय के साथ ही पहली बार मीडिया के विभिन्न सैद्धान्तिकीकरण अस्तित्व में आये। मुद्रण का आविष्कार पन्द्रहवीं सदी में हुआ। मुद्रण की संस्कृति का विकास सोलहवीं.सत्रहवीं सदी तक अपने चरम पर पहुँच रहा था। पहले किताबों और अन्य मुद्रित सामग्रियों की पहुँच व्यापक पैमाने पर मौजूद नहीं थी। लेकिन मुद्रण की संस्कृति के विकास के साथ और 1440 में मुद्रण प्रेस के आविष्कार के साथ प्रिण्ट मीडिया का उद्भव हो चुका था। दुनिया का पहला अखबार 1605 में जर्मन भाषा में निकलना शुरू हुआ था। तमाम सिद्धान्तकारों ने शिक्षा के विस्तार, मुद्रण संस्कृति के विकास और एक बुर्जुआ ‘पब्लिक स्फियर’ के निर्माण पर काम किया है, हम यहाँ उसके विस्तार में नहीं जा सकते और आगे हम इस पर अवश्य लिखेंगे। लेकिन एक बात तय है कि अपनी व्यवस्था के कायम होने से पहले भी बुर्जुआ वर्ग ने प्रिण्ट संस्कृति का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल किया था और अपनी व्यवस्था के स्थापित होने के बाद भी उसने अपने शासन के पक्ष में सहमति के निर्माण के लिए मीडिया का एक वर्चस्वकारी प्रणाली के तौर पर इस्तेमाल जारी रखा है।

बुर्जुआ मीडिया किस तरीके से बुर्जुआ वर्ग के शासन के लिए जनता में सहमति का निर्माण करता है, यह समझना भी ज़रूरी है। बुर्जुआ मीडिया आखिर करता क्या है? यह वास्तव में बुर्जुआ वर्ग के विचारों, उसके विश्व दृष्टिकोण, उसके दर्शन, राजनीति और संस्कृति का जनता के बीच सतत् प्रचार करता है। निश्चित तौर पर, यह काम यान्त्रिक तरीके से नहीं होता है, बल्कि बेहद जटिल, विरोधाभासी और अन्तरविरोधी तरीके से होता है, लेकिन इस पर आगे आयेंगे। इस प्रक्रिया में मीडिया लोगों को चीज़ों को देखने का एक नज़रिया देता है। यह विभिन्न परिघटनाओं के लिए लोगों को एक व्याख्यात्मक चौखटा (इण्टरप्रेटिव फ्रेमवर्क) देता है। यह व्याख्यात्मक चौखटा लोगों को वास्तविक आलोचनात्मकता से महरूम करता है, और उन्हें एक छद्म आलोचनात्मकता देता है। वास्तव में, यह बुर्जुआ शासन और संस्कृति की एक सबवर्सिव आलोचना प्रस्तुत कर पाने की क्षमता पर चोट करता है। ऐसा नहीं है कि यह बुर्जुआ व्यवस्था और समाज के बारे में लोगों को कोई आलोचनात्मकता नहीं देता। कई बार तो अगर लोग स्वयं बुर्जुआ वर्ग के शासन के प्रति कोई आलोचनात्मक रूप अभिव्यक्त नहीं करते, तो स्वयं बुर्जुआ मीडिया उसकी एक आलोचना प्रस्तुत कर देता है। लेकिन यह आलोचना सुधारात्मक होती है, परिवर्तनकारी नहीं, और यही लोगों के बीच हावी हो जाती है। पूँजीवादी व्यवस्था प्रश्नों के दायरे से बाहर कभी नहीं रहना चाहती है। वह कई बार स्वयं ही प्रश्नों को उठाती है और अपने आपको कठघरे में खड़ा करती है। लेकिन ये पुंसत्वहीन प्रश्न होते हैं, जो किसी भी रूप में उसके लिए ख़तरा नहीं बन सकते। ऐसे में, बुर्जुआ वर्ग अपने आपको ज़्यादा सामान्य, वास्तविक और नैसर्गिक दिखलाता है, ताकि लोग उससे अपने आपको जोड़कर देख सकें। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिण्ट मीडिया दोनों ही इस काम को बखूबी अंजाम देते हैं। चाहे आप फिल्मों को देखें, या फिर मनोरंजन चैनलों और समाचार चैनलों को (हालाँकि अब दोनों के बीच की सीमा.रेखा काफ़ी धुंधली होती जा रही है), आप इस प्रणाली को काम करते हुए देख सकते हैं।

बुर्जुआ मीडिया लोगों को एक व्याख्यात्मक ढाँचा देते हुए दरअसल बुर्जुआ वर्ग के दृष्टिकोण, उसके मूल्यों और विचारों को ‘सामान्य बोध’ के रूप में स्थापित करता है। मिथकों को सामान्य बोध बना दिया जाता है; हरेक असुविधाजनक यथार्थ और वास्तविकता को अनिवार्य बुराई में तब्दील कर दिया जाता है; बुर्जुआ वर्ग के शासन को उच्चतम और सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक रूप करार दिया जाता है, ज़िसमें निश्चित तौर पर कुछ दिक्कतें हैं, लेकिन ज़िससे बेहतर की मानवता उम्मीद नहीं कर सकती है। बुर्जुआ वर्ग के शासन को प्रकृति की गति का चौथा नियम करार दिया जाता है। इस मायने में फ्रांसिस फुकुयामा ने कोई नया काम नहीं किया था, जब उसने दावा किया था कि उदार बुर्जुआ जनवाद इतिहास का अन्त है! प्रबोधन के बुर्जुआ दार्शनिकों ने भी यही दावा किया था; बस फर्क यह है कि उन्होंने यह दावा एक क्रान्तिकारी इरादे और मंशा के साथ किया था और यह उनकी वर्ग दृष्टि की सीमा थी कि वह बुर्जुआ वर्ग के शासन को नैसर्गिक और स्वाभाविक शासन के रूप में देख रहे थे। अपने युग की सीमाओं में प्रबोधन के दार्शनिकों का दावा एक क्रान्तिकारी दावा था, बुर्जुआ वर्ग की भूमिका उस समय ऐतिहासिक तौर पर प्रगतिशील थी। लेकिन फ्रांसिस फुकुयामा जर्जर, खोखले और मरणासन्न पूँजीवाद की पैदावार है, और यह बूढ़े.बीमार पूँजीवाद के सांस्कृतिक तर्क को पेश करने का काम कर रहा था। दावा वही था, लेकिन ऐतिहासिक सन्दर्भ के बदलने के साथ दावे के अर्थ भी बदल गये। बुर्जुआ वर्ग जो व्याख्यात्मक ढाँचा या चौखटा लोगों को मुहैया कराता है और ज़िस ‘सामान्य बोध’ को वह स्थापित करता है, उसके विकल्प के तौर पर लोगों के पास कोई सहज रूप से मुहैया और तत्काल उपलब्ध वैकल्पिक व्याख्यात्मक ढाँचा और अर्थों की व्यवस्था (मीनिंग सिस्टम) नहीं होता है। यह ढाँचा कभी स्वतःस्फूर्त तौर पर उपलब्ध हो भी नहीं सकता है, और इसके केवल सचेतन तौर पर खड़ा किया जा सकता है। इस वैकल्पिक क्रान्तिकारी मीडिया के सवाल पर हम आगे आयेंगे। पहले बुर्जुआ मीडिया को लेकर जो सैद्धान्तिकीकरण किये गये हैं, उनपर एक संक्षिप्त दृष्टि डाल लेना हमारे आगे की चर्चा के लिए उपयोगी होगा।

ज़िस तरीके से बुर्जुआ मीडिया बुर्जुआ वर्ग के विचारों, दर्शन और संस्कृति के वर्चस्व को स्थापित करता है, ज़िस प्रकार से वह जनता को आज्ञाकारी, दासवत और अपनी इस अधीनस्थ स्थिति के प्रति असचेत बनाता है, और स्वतन्त्रता की छद्म चेतना का निर्माण करता है, उस पर तमाम सिद्धान्तकारों ने गम्भीर काम किया है। कुछ परिप्रेक्ष्यों ने मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर ध्यान केन्द्रित किया है, कुछ ने उसकी सांस्कृतिक-राजनीतिक और विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु पर, तो कुछ अन्य ने मीडिया द्वारा पेश सामग्री को जनता द्वारा ग्रहण करने की प्रक्रिया पर शोध किया है। कुछ अन्य दृष्टिकोण हैं ज़िन्होंने मीडिया द्वारा विशेष तौर पर मज़दूर वर्ग को राजनीतिक तौर पर अधीन करने, उसे कुसंस्कृति के घटाटोप में डुबा डालने और अफीम के समान नशे में रखने के पहलू पर काम किया है। मानना पड़ेगा कि अलग-अलग मार्क्सवादी स्कूलों के मीडिया पर जो दृष्टिकोण हैं, उनमें आंशिक सच्चाइयाँ हैं। लेकिन इन सभी दृष्टिकोणों में अलग-अलग तरीके से ग़ैर.द्वन्द्वात्मकता निहित है।

मार्क्स ने जर्मन विचारधारा’ में लिखा था, जिस वर्ग के पास भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं, वही मानसिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है, ज़िसके नतीजे के तौर पर, आम तौर पर कहें तो वे लोग ज़िनके पास मानसिक उत्पादन के साधन नहीं होते हैं, वे शासक वर्ग के अधीन हो जाते हैं।” इसी के आधार पर मार्क्स ने कहा था कि हर युग के शासक विचार शासक वर्गों के विचार होते हैं। निश्चित तौर पर, इसका अर्थ यह नहीं है कि शासक वर्ग के विचारों का कोई प्रतिरोध मौजूद नहीं होता है। बीसवीं सदी में कई मार्क्सवादी मीडिया सिद्धान्तकारों ने मार्क्स की इस सोच को तकनोलॉज़िकल नियतत्ववाद और आर्थिक निर्धारणवाद के तौर पर देखा। लेकिन यह दृष्टिकोण मार्क्स के विचारों के साथ न्याय नहीं करता। मार्क्स का मानना था कि उत्पादन सम्बन्धों का कुल योग समाज के आर्थिक आधार की रचना करता है, और हर आर्थिक आधार अपनी सेवा करने वाली अधिरचना खड़ी करता है। संसद, नौकरशाही, न्यायपालिका, पुलिस और फौज से लेकर राजनीतिक प्रचार के तमाम उपकरण, जैसे कि अखबार, फिल्में, साहित्य आदि इसी अधिरचना का अंग होते हैं। मार्क्स यहाँ इस बात को लेकर सचेत हैं कि अधिरचना आर्थिक आधार से निर्धारित होने के बाद उसे प्रभावित भी करती है और उनके बीच एक द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध होता है। यह ग़ौरतलब है कि मार्क्स अपने युग के कई सामाज़िक आलोचकों के प्रशंसक थे, जो कि बुर्जुआ समाज और संस्कृति की आलोचना पेश कर रहे थे। मिसाल के तौर पर, चार्ल्स डिकेंस और बाल्ज़ाक जैसे लोग। ऐसे साहित्यकार और आलोचक बुर्जुआ अधिरचना की सापेक्षिक स्वायत्तता के फलस्वरूप ही पैदा हो सकते हैं। लेकिन बाद के कई मार्क्सवादी सिद्धान्तकारों ने मार्क्स पर यह आरोप भी लगाया कि वह आर्थिक आधार को ही हर क्षण में प्रभावी रूप से निर्धारण करने वाला अन्तिम निर्धारक तत्व मानते थे। मार्क्स का ऐसा विचार नहीं था और उनका ऐसा विचार हो भी नहीं सकता था, क्योंकि फिर मार्क्स दुनिया को बदलने का, क्रान्ति करने का कोई सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं कर सकते थे। सर्वहारा राजनीतिक क्रान्ति अधिरचना में ही शुरू होती है, और आर्थिक आधार के क्रान्तिकारी रूपान्तरण का काम सर्वहारा अधिनायकत्व की स्थापना के बाद ही शुरू होता है। लेकिन इसके बावजूद उत्तरवर्ती मार्क्सवादी मीडिया सिद्धान्तकारों ने इस बात को नज़रअन्दाज़ किया है और मार्क्स पर तकनोलॉज़िकल और आर्थिक नियतत्ववाद के आरोप लगाये हैं। मार्क्स ने एक दृष्टि, एक पहुँच और पद्धति पेश की। मीडिया का विश्लेषण उनका प्रमुख कार्य नहीं था। लेकिन मार्क्सवादी दृष्टिकोण एक बेहद वैज्ञानिक और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी पद्धति देता है, ज़िससे कि मीडिया का एक सन्तुलित आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जा सकता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण के मुताबिक बुर्जुआ वर्ग के वर्चस्व को कायम करने की प्रक्रिया में मीडिया जो काम करता है वह है राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से यथास्थिति का पुनरुत्पादन करना, ज़िससे कि आर्थिक सम्बन्धों का भी पुनरुत्पादन जारी रखा जा सके; दूसरा काम है मज़दूर वर्ग में एक छद्म चेतना का निर्माण करना, जो कि बुर्जुआ विचारधारा का एक प्रमुख कार्य है; तीसरा कार्य जो मीडिया करता है वह है जनता को शासक वर्ग के नज़रिये से चीज़ों को देखने की आदत डलवाना; और चौथा कार्य है हर बुर्जुआ आस्था, नज़रिये और मिथक को ‘सामान्य बोध’ के तौर पर स्थापित करना। इस पूरी प्रक्रिया के ज़रिये मीडिया (और अन्य बुर्जुआ विचारधारात्मक उपकरण) एक बुर्जुआ सब्जेक्ट की रचना करते हैं। बुर्जुआ सब्जेक्ट पैदा नहीं होता बल्कि उसका निर्माण किया जाता है। व्यक्ति पर बुर्जुआ विचारधारा के वर्चस्व को स्थापित करके ही बुर्जुआ सब्जेक्ट का निर्माण किया जा सकता है। लेकिन क्या यह बुर्जुआ सब्जेक्ट प्रतिक्रियात्मक नहीं है? क्या वह बुर्जुआ विचारधारा का निष्क्रिय शिकार है? क्या वह बस निष्क्रिय प्राप्तकर्ता या ग्राहक है? या उसके बुर्जुआ विचारधारा, मूल्यों और संस्कृति को ग्रहण करने की उसकी पूरी प्रक्रिया स्वयं एक द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया है, एक संघर्ष का स्थान है? इसे लेकर मार्क्सवादी मीडिया सिद्धान्तकारों में एक बहस है। मोटे तौर पर, उन्हें दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। एक का मानना है कि ‘सूचना समाज’, ‘उत्तरऔद्योगिक समाज’ और आधुनिक मीडिया के उदय के साथ मज़दूर वर्ग अपने परिवर्तन के अभिकरण को खो बैठा है; ‘संस्कृति उद्योग’ ने प्रतिरोध की सम्भावनाओं को ख़त्म कर दिया है और मज़दूर वर्ग (और अडोर्नो के अनुसार स्वयं बुर्जुआ वर्ग भी!) राजनीतिक तौर पर विघटित हो चुका है। इस श्रेणी में आने वाले मार्क्सवादी सिद्धान्तकार (अपनी तमाम भिन्नताओं के साथ) निराशावाद के गड्ढे में चले गये हैं, कुछ मामलों में सचेतन तौर पर और कुछ मामलों में अनजाने में। इनका मानना है कि मीडिया द्वारा मसि्तष्कों पर जो वर्चस्व स्थापित किया गया है, वह पूर्ण है, व्यापक है, और इतना सघन है कि उसने हर प्रकार के अधीनस्थ वर्गों के हर प्रकार के अभिकरण को पुंसत्वहीन बना दिया है। एक मायने में उनकी सोच पूर्ण मानसिक नियन्त्रण की है। लेकिन ये सिद्धान्तकार यह भूल जाते हैं कि शासित जनता में शामिल तमाम व्यक्ति जो इस बुर्जुआ मीडिया द्वारा परोसी जा रही सामग्री को देखते हैं, वे अपनी चेतना का निर्धारण सिर्फ इसी कारक से नहीं करते बल्कि अपने जीवन की भौतिक परिस्थितियों से भी करते हैं। वास्तव में, शासक वर्गों द्वारा परोसी जा रही सांस्कृतिक सामग्री को ग्रहण करने की उनकी पूरी प्रक्रिया ही इस बात से निर्धारित होती है कि समाज के वर्गीय ढाँचे में उनकी स्थिति और स्थान क्या है। वे मास संस्कृति को एक सजातीय, एकाश्मीय संरचना मानते हैं और उसके आन्तरिक द्वन्द् को नहीं समझते। नतीजतन, अडोर्नो और होर्कहाइमर जैसे सिद्धान्तकार समूची मास संस्कृति को कोसते हुए, वस्तुगत तौर पर मैथ्यू अर्नाल्ड, टी.एस.इलियट, हक्सले, आदि जैसे रूढ़िवादी बुर्जुआ विश्लेषकों की अवस्थिति पर जाकर खड़े हो जाते हैं।

मार्क्सवादी सिद्धान्तकारों का एक स्कूल मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर अपना विश्लेषण केन्द्रित करता है। यह स्कूल मीडिया के क्षेत्र में स्वामित्व सम्बन्धों का अध्ययन करते हुए, वहाँ हो रहे इज़ारेदारीकरण की ओर ध्यानाकर्षित करते हैं और बताते हैं कि यह आर्थिक पहलू बुर्जुआ मीडिया के पूरे चरित्र को निर्धारित कर देता है। अराजकतावादी चिन्तक नोम चॉम्स्की इस दृष्टिकोण के काफ़ी करीब हैं, हालाँकि उनकी शब्दावली मार्क्सवादी शब्दावली से बिल्कुल अलग है। उनके विचार में मीडिया वर्ग प्रभुत्व का उपकरण है। चॉम्स्की ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेण्ट’ में एक ‘प्रोपगैण्डा मॉडल’ पेश करते हैं, ज़िसके मुताबिक आधुनिक मीडिया की चार आभिलाक्षणिक विशिष्टताएँ हैं। पहला, स्वामित्व में संकेन्द्रण; दूसरा, पूँजीपतियों द्वारा दिये जाने वाले प्रचार का मीडिया की आय का प्रमुख स्रोत बनना; तीसरा, पत्रकारों की सूचना के लिए राज्य द्वारा प्रदत्त स्रोतों पर निर्भरता; और चौथा, कम्युनिज़्म.विरोध का एक राष्ट्रीय धर्म में तब्दील कर दिया जाना। चॉम्स्की के मॉडल और मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र मॉडल में जो बात समान है, वह है आर्थिक आधार और अधिरचना के बीच के सम्बन्धों का गै़र.द्वन्द्वात्मक सरलीकरण, जहाँ अधिरचना हरेक क्षण आर्थिक आधार की सेवा कर रही है, पूरी तरह प्रबन्धित और जड़ित है। सहमति के निर्माण में अन्तोनियो ग्राम्शी का दृष्टिकोण ज़्यादा द्वन्द्वात्मक था। उनके अनुसार बुर्जुआ विचारधारात्मक उपकरणों का कार्य है जनता के बीच बुर्जुआ वर्ग के शासन के लिए सहमति का निर्माण। लेकिन ज़िस अधिरचनात्मक सन्दर्भ में ये उपकरण काम करते हैं, वह हर क्षण आर्थिक आधार से समानुपातिक रूप से निर्धारित नहीं होते हैं। राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिरचना की एक सापेक्षिक स्वायत्तता होती है। वर्चस्व कोई दिया गया तथ्य नहीं है, बल्कि बुर्जुआ वर्ग को इसे बार.बार निर्मित करना होता है, जीतना होता है और कायम रखना होता है। इस कार्य में विचारधारा और संस्कृति की भूमिका केन्द्रीय हो जाती है; (बुर्जुआ) बुद्धिजीवी विचारधारा और संस्कृति के उपकरणों का इस्तेमाल बुर्जुआ वर्ग के वर्चस्व को बार.बार स्थापित करने के लिए करते हैं। लेकिन चूँकि यह पूरी प्रक्रिया एकरेखीय नहीं है, बल्कि द्वन्द्वात्मक है, इसलिए वर्चस्व स्वयं एक संघर्ष का स्थान बन जाता है। कम्युनिस्टों का यह कर्तव्य बनता है कि इस स्पेस में हस्तक्षेप करें और प्रति-वर्चस्व (काउण्टर-हेजेमनी) का निर्माण करें। इसलिए ग्राम्शी का सिद्धान्त जनप्रतिरोध और परिवर्तन को एक अभिकरण मुहैया कराता है, आत्मगत शक्तियों के सचेतन प्रयासों की सम्भावनाओं को रेखांकित करता है।

फ्रैंकफर्ट स्कूल के नज़रिये को अक्सर भौंडे, नियतत्ववादी और पारम्परिक मार्क्सवादी नज़रिये का खण्डन माना जाता है। लेकिन अगर हम अडोर्नो और होर्कहाइमर के ‘संस्कृति उद्योग’ के विश्लेषण को देखें तो हम पाते हैं कि वास्तव में उनका दृष्टिकोण स्वयं एक पराजयवादी, निराशावादी नियतत्ववाद का शिकार है और वे स्वयं मार्क्सवादी की अर्थवादी और निर्धारणवादी समझदारी के करीब पड़ते हैं। उनके अनुसार, कलात्मक रचनाओं के यान्त्रिक पुनरुत्पादन के युग में एक संस्कृति उद्योग अस्तित्व में आया है। यह संस्कृति उद्योग सांस्कृतिक मालों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे कि दस्तकारी के युग से मैन्युफैक्चरिंग और मैन्युफैक्चरिंग के युग से मशीनोफैक्चरिंग के युग में भौतिक उत्पादन का संक्रमण। पहले उत्पाद पर कारीगर की छाप होती थी, उसका एक वैयक्तिक ‘प्रभा मण्डल’ होता था। लेकिन जैसे ही सांस्कृतिक उत्पादन बड़े पैमाने के उत्पादन में तब्दील हो गया, और एक संस्कृति उद्योग अस्तित्व में आया वैसे ही सभी सांस्कृतिक उत्पादों की विशिष्टता समाप्त हो गयी; उनका ‘प्रभा मण्डल’ जाता रहा; संस्कृति की स्वायत्तता ख़त्म हो गयी और सांस्कृतिक उत्पादन बुर्जुआ वर्ग के हाथों में प्रभुत्व का एक अचूक उपकरण बन गया। अडोर्नो कहते हैं कि मार्क्स इस बारे में ग़लत थे कि उत्पादक शक्तियों (ज़िसे अडोर्नो सिर्फ तकनोलॉजी के रूप में देख रहे हैं) का विकास क्रान्तिकारी परिस्थितियाँ पैदा करेगा। अडोर्नो के अनुसार संस्कृति के क्षेत्र में उत्पादक शक्तियों के विकास ने वास्तव में एक स्थायी प्रतिक्रिया की स्थिति पैदा कर दी है। संस्कृति, ज़िसका पहले यह काम था कि वह जनसमुदायों को अनुपस्थिति प्रगतिशील मूल्यों की आपूर्ति करे, ज़िसका पहले यह काम था कि वह जनता को एक प्रगतिशील यूटोपिया दे; ज़िसका काम था द्वन्द्वात्मक रूप से प्रगतिशील भविष्य की परिकल्पना करना; वह संस्कृति अब महज़ बुर्जुआजी के वर्चस्व के पुनरुत्पादन का उपकरण बन गयी है। संस्कृति का कार्य सिर्फ बुर्जुआ आर्थिक और राजनीतिक सम्बन्धों का पुनरुत्पादन करना रह गया है। यह सामूहिक मतिभ्रम/कपट (मास डिसेप्शन) का उपकरण बन चुकी है, यही बुर्जुआ मास संस्कृति का काम है, ज़िसे संस्कृति उद्योग उत्पादित कर रहा है। हरबर्ट मार्क्यूस ने कहा कि बुर्जुआ मास संस्कृति ने संस्कृति का जो एकरूपीकरण, सजातीयकरण और एकाश्मीकरण किया है उसने इस संस्कृति को ग्रहण करने वाले मनुष्यों का भी एक फासीवादी मानकीकरण कर दिया है। इसने एक एकआयामी मनुष्य को जन्म दिया है जो कि किसी भी किस्म का प्रतिरोध उपस्थित करने में असमर्थ है और पूरी तरह से बुर्जुआ विचारधारा के नियन्त्रण में है। फिर अडोर्नो, होर्कहाइमर और मार्क्यूस इस पूरी परिघटना को प्रबोधन और तार्किकता से जोड़ देते हैं; नतीजतन, पूरा का पूरा प्रबोधन बुर्जुआ वर्ग के प्रभुत्व को स्थापित करने वाला प्रोजेक्ट बन जाता है। आप देख सकते हैं कि फ्रैंकफर्ट स्कूल उन्हीं नतीजों के करीब पहुँच जाता है, ज़िसके करीब आज के प्राच्यवादी, उत्तरसंरचनावादी, उत्तरऔपनिवेशिक विचार के हामी, और उत्तरआधुनिकतावादी हैं। ऐसे किसी भी सैद्धान्तिकीकरण में यह अन्तर्निहित होता है, कि मार्क्सवाद, या कम-से-कम “पारम्परिक” और “रूढ़िवादी” मार्क्सवादी भी इसी परियोजना का एक अंग है। आप देख सकते हैं कि यह पूरा दृष्टिकोण प्रतिरोध या परिवर्तन की सम्भावना से इंकार कर देता है। यह एक प्रकार से मज़दूर वर्ग के राजनीतिक विघटन की बात करता है। वर्ग चेतना समाप्त हो जाती है और मज़दूर वर्ग एटमीकृत एकआयामी व्यक्तियों का एक एग्रीगेशन बन जाता है। यह पूरी सोच पराजयवाद में ख़त्म होती है। हालाँकि बाद में अपने लेख ‘फ्री टाइम’ और ‘कल्चर इण्डस्ट्री रीकंसिडर्ड’ में अडोर्नो अपनी थीसिस में कुछ महत्वपूर्ण तब्दीलियाँ लाते हैं और संस्कृति उद्योग के एकतरफा प्रभुत्व की बात को रद्द करते हैं, लेकिन कुल मिलाकर नतीजे में कोई बड़ा गुणात्मक फर्क नहीं आता है। फ्रैंकफर्ट स्कूल के आलोचनात्मक सिद्धान्तकारों के निराशावाद का एक कारण जर्मनी में नात्सीवाद का उदय भी था, ज़िसमें कि वह संस्कृति उद्योग, प्रबोधन और तार्किकता के नतीजे देखते थे। और बाद में अमेरिका में हॉलीवुड, जाज़ संगीत आदि के विश्लेषण के ज़रिये भी उनकी यह धारणा उनकी निगाह में पुष्ट हुई। लेकिन यह पूरा दृष्टिकोण बुरी तरह से एकतरफा था और ऐसा लगता है, कि फ्रैंकफर्ट स्कूल के सिद्धान्तकारों का पूरा सैद्धान्तिकीकरण उनके अपने मानसिक आघात/सदमे से काफ़ी ज़्यादा प्रभावित था!

वॉल्टर बेंजामिन का दृष्टिकोण यह था एक बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक वस्तुओं का उत्पादन होना, उनके यान्त्रिक पुनरुत्पादन का सम्भव बनना, सांस्कृतिक रचना के ‘प्रभा मण्डल’ का समाप्त होना और उस चीज़ का अस्तित्व में आना ज़िसे अडोर्नो संस्कृति उद्योग की संज्ञा देते हैं, एक सकारात्मक परिवर्तन है। वास्तव में, इसने संस्कृति का जनवादीकरण किया है, इसकी पहुँच को व्यापक और गहरा बनाया है, जनता द्वारा इसमें हस्तक्षेप को सम्भव बना दिया है। इसका कारण यह है कि सांस्कृतिक माल का उपभोग करने वाला उपभोक्ता स्वयं एक वस्तु (ऑब्जेक्ट) नहीं है, जैसा कि अडोर्नो का मानना है, बल्कि वह स्वयं एक सब्जेक्ट है। वह सोच सकता है और उसकी सोच केवल संस्कृति उद्योग एकतरफ़ा तरीके से निर्धारित नहीं करता ।

फ्रांसीसी संरचनावादी मार्क्सवादी लुई अल्थूसर ने भी कुछ सिद्धान्त पेश किये ज़िनका मीडिया अध्ययन में काफ़ी इस्तेमाल हुआ है। अल्थूसर का मानना था कि आर्थिक आधार अधिरचना को ऐतिहासिकता में निर्धारित करता है, लेकिन पलटकर अधिरचना भी आर्थिक आधार को निर्धारित करती है। दूसरी बात यह कि आर्थिक तौर पर निर्धारित होने के बाद, चीज़ें अन्य कारकों के ज़रिये अति.निर्धारित भी होती हैं। मनुष्यों की चेतना विचारधारा का निर्माण नहीं करती, बल्कि यह विचारधारा है जो कि मनुष्यों की चेतना पर नियन्त्रण करने का प्रमुख उपकरण है। यह उपकरण स्वयं आर्थिक संरचनाओं से निर्धारित होता है, लेकिन वास्तव में इसका कार्य ही यही है कि लोगों की चेतना और उनकी भौतिक अवस्थिति में एक अन्तर पैदा किया जाय। विचारधारा और कुछ नहीं बल्कि मनुष्यों द्वारा अपनी भौतिक परिस्थितियों की एक कल्पना है, जो कि यथार्थ को प्रतिबिम्बित नहीं करती। शासक वर्ग के विचारधारात्मक राज्य उपकरण (आइडियोलॉज़िकल स्टेट ऐपरेटस) विचारधारा के इस कार्य के द्वारा बुर्जुआ सब्जेक्ट का निर्माण करते हैं। इसी को अल्थूसर इण्टरपिलेशन का नाम देते हैं, ज़िसके अनुसार पहले से मौजूद संरचनाओं से निर्धारित स्थितियाँ एक व्यक्ति को सब्जेक्ट में तब्दील करती हैं। यह विचार काफी हद तक जैक्स लकाँ के मिरर स्टेज के सिद्धान्त से प्रभावित था। इस पर हम आगे कभी विस्तार से लिखेंगे। अल्थूसर भी अपने अलग सैद्धान्तिकीकरण के बावजूद, एक मायने में अनकहे तरीके से उसी नतीजे पर पहुँच जाते हैं ज़िस पर कि अडोर्नो पहुँचे थे। अल्थूसर के विचारधारात्मक राज्य उपकरण के सिद्धान्त में भी सब्जेक्ट विचारधारा का निष्क्रिय शिकार बन जाता है। निश्चित तौर पर, विचारधारा की अपनी परिभाषा में अल्थूसर मार्क्स की तरफ़ वापस लौटते हैं, क्योंकि मार्क्स स्वयं बुर्जुआ विचारधारा की आलोचना पेश कर रहे थे, ज़िसका कि कार्य ही एक छद्म चेतना का निर्माण होता है। लेकिन अल्थूसर के लिए विचारधारात्मक राज्य उपकरण द्वारा इण्टरपिलेशन की प्रक्रिया के ज़रिये सब्जेक्ट के निर्माण में व्यक्ति की कोई भूमिका नहीं होती। वह एक निष्क्रिय कारक बन जाता है, ज़िस पर विचारधारा अपना काम करती है। अल्थूसर ने कभी इस नतीजे को शब्दशः लिखा नहीं है। लेकिन उनका सिद्धान्त इसी ओर जाता है।

अल्थूसर और फ्रैंकफर्ट स्कूल के सिद्धान्तकारों के बरक्स ग्राम्शी का और वॉल्टर बेंजामिन का दृष्टिकोण ज़्यादा दुरुस्त लगता है, कम.से.कम इस मामले में कि उनके सैद्धान्तिकीकरण में आप मीडिया के असहाय शिकार नहीं दिखते हैं! आपके पास प्रतिरोध करने का अभिकरण है। आप स्वयं एक अभिकर्ता हैं। इसी पहलू पर ब्रिटिश सांस्कृतिक सिद्धान्तकार स्टुअर्ट हॉल ने भी बल दिया और बताया कि लोगों द्वारा मीडिया की सामग्री को ग्रहण करने की प्रक्रिया को अभी तक बहुत सरलीकृत और एकतरफ़ा तौर पर देखा गया है, जबकि यह प्रक्रिया एक बेहद जटिल प्रक्रिया है और लोगों की वर्ग अवस्थिति से निर्धारित होती है। हॉल का मानना है कि किसी भी सांस्कृतिक वस्तु के तीन प्रकार के पाठ होते हैं। हर सांस्कृतिक वस्तु में शासक वर्ग का विचारधारात्मक उपकरण कुछ अर्थों की एनकोडिंग करता है। ये अर्थ देखने, सुनने या पढ़ने वाले के पास उसी रूप में नहीं पहुँचते हैं। इस सांस्कृतिक वस्तु को ग्रहण करने वाला व्यक्ति इसका अपना पाठ करता है, जो कि उसकी वर्ग अवस्थिति से निर्धारित होता है। उसका व्याख्यात्मक ढाँचा बिल्कुल वैसा ही नहीं होता है, जैसा कि शासक वर्ग चाहता है। वह अपने व्याख्यात्मक चौखटे के द्वारा एनकोडेड अर्थों का पाठ करता है, उन्हें डीकोड करता है। स्टुअर्ट हॉल तीन प्रकार के पाठों की बात करते हैं। पहला है, प्रभावी पाठ (डॉमिनेण्ट रीडिंग), ज़िसमें व्यक्ति लगभग उसी व्याख्यात्मक ढाँचे का इस्तेमाल कर रहा है, जो कि शासक वर्ग चाहता है। यानी, कि शासक वर्ग की दृष्टि से ही चीज़ों को देखा जा रहा है और जो अर्थ सम्प्रेषित करना शासक वर्गों का इरादा था, वही अर्थ सम्प्रेषित हुए हैं। एक दूसरे किस्म का पाठ होता है समझौता करने वाला पाठ (नेगोशियेटेड रीडिंग)। इसमें व्यक्ति कुछ अर्थों को उसी रूप में अपनाता है, ज़िस रूप में शासक वर्ग चाहते हैं, लेकिन अन्य अर्थों को वह अपनी वर्ग अवस्थिति के मुताबिक बदल देता है। और तीसरी अवस्थिति होती है उस व्यक्ति की जो कि विरोधात्मक पाठ (अपोज़ीशनल रीडिंग) करता है। इसमें व्यक्ति शासक वर्गों के इरादों को विनिर्मित करने का प्रयास करता है, उनके द्वारा सम्प्रेषित अर्थों की चीर.फाड़ करता है और उसका एक सबवर्सिव पाठ करता है। कौन सा व्यक्ति किस किस्म का पाठ करेगा, किस किस्म से बुर्जुआ संस्कृति उद्योग के मालों का उपभोग करेगा, यह उस व्यक्ति की वर्ग अवस्थिति, राजनीतिक अवस्थिति, इतिहास और संस्कृति पर निर्भर करता है। यहाँ पर स्टुअर्ट हॉल वोलोशिनोव के काफी करीब पड़ते हैं, ज़िनका मानना था कि अर्थ कोई पूर्वप्रदत्त वस्तु नहीं है, बल्कि अर्थों के लिए एक वर्ग संघर्ष होता है। अल्थूसर और फ्रैंकफर्ट स्कूल यहीं पर एक पराजयवादी निर्धारणवाद का शिकार हैं। ग्राम्शी इसी निर्धारणवाद का अपने तरीके से विरोध करते हैं और वोलोशिनोव अपने तरीके से। अन्य कई माक्र्सवादी विचारक और स्कूल हैं, ज़िनके सिद्धान्तों का हम आगे के अंकों में एक.एक करके विश्लेषण पेश करेंगे, लेकिन मोटे तौर पर विश्लेषण की श्रेणियाँ यही हैं।

हमारा मानना है कि आज के युग में कोई भी गम्भीर प्रेक्षक या विश्लेषणकर्ता उन उदार बुर्जुआ सिद्धान्तों को नहीं मानता है ज़िनके अनुसार मीडिया एक बहुलतावादी समाज को जन्म देते हैं और एक मुक्त मीडिया मज़बूत जनवाद की शर्त है, वगैरह। यह पूरा विचार मीडिया को एक निष्पक्ष, मुक्त एजेंसी मानता है, जो कि मीडिया नहीं है। दूसरी ओर, ऐसे “मार्क्सवादी” विश्लेषणों को भी हम ख़ारिज करते हैं जो आधार और अधिरचना के बीच के सम्बन्धों को किसी भी रूप में एकतरफ़ा तौर पर पेश करते हैं। हमारा मानना है कि मार्क्सवादी मीडिया सिद्धान्त में मौजूद निराशावादी नियतत्ववाद की धारा भी, आंशिक तौर पर कुछ सच्चाइयों को पकड़ने के बावजूद एक द्वन्द्वात्मक अवस्थिति नहीं अपनाती है और जनता को कोई अभिकरण नहीं देती है। कुछ नवमार्क्सवादी सिद्धान्तकारों ने इस तथ्य पर बल दिया है कि जनता बुर्जुआ संस्कृति का अपना पाठ करती है और इसमें उसके प्रतिरोध की गुंजाइश होती है; इस बात से हम सहमत हैं, लेकिन इसमें भी यह कमी है कि अन्ततः यह पाठ का सवाल भाषा के सवाल पर जाकर केन्द्रित हो जाता है और भाषा अपने आप में एक स्वायत्त और स्वतन्त्र कारक बन जाती है, और कई बार ऐसे विश्लेषण का भाषाई निर्धारणवाद में गिरने का ख़तरा होता है। इसमें दूसरी कमी यह है कि जनता का प्रतिरोध उसके वैकल्पिक पाठ और ग्रहणशीलता से ही निर्मित हो जायेगा, ऐसा सोचना ग़लत है। जनता को अपना प्रतिरोध संगठित करने के लिए अपना वैकल्पिक मीडिया खड़ा करना होगा; कम्युनिस्ट आन्दोलन को मीडिया के मोर्चे पर काम करते हुए समानान्तर संस्थाएँ खड़ी करनी होंगी; इस पर ये नवमार्क्सवादी सिद्धान्तकार ध्यान नहीं देते हैं।

इसलिए हमारे विचार में जहाँ एक ओर यह बात सही है कि जनता बुर्जुआ मीडिया की निष्क्रिय और असहाय शिकार नहीं होती है, जैसा कि फ्रैंकफर्ट स्कूल के सिद्धान्त और अल्थूसर का विचारधारात्मक राज्य उपकरण का सिद्धान्त कहता है; वहीं यह भी सही है कि अधिक से अधिक सबवर्सिव पाठ करने वाले व्यक्ति के पास भी कोई सकारात्मक व्याख्यात्मक ढाँचा नहीं होता है, ज़िससे कि वह दुनिया को देखे और समझे। उसके पास कोई क्रान्तिकारी नज़रिया स्वतःस्फूर्त तौर पर नहीं होता है, भले ही वह बुर्जुआ विचारधारात्मक उपकरण द्वारा परोसी जा रही सामग्री पर आँख मूँदकर भरोसा न करता हो। एक मज़दूर चाहे अपनी वर्ग अवस्थिति और अपने जीवन की ठोस सच्चाइयों से निर्मित चेतना की ज़मीन पर खड़े होकर तमाम बुर्जुआ प्रचार को अविश्वास की दृष्टि से देखता हो और उसे ख़ारिज करता हो तो भी उसके पास कोई बना-बनाया क्रान्तिकारी व्याख्यात्मक ढाँचा नहीं होता है। यह महज़ बुर्जुआ प्रचार का नकार है, कोई सकारात्मक और सचेतन अर्जित किया गया क्रान्तिकारी नज़रिया नहीं है। ऐसा नज़रिया सर्वहारा अवस्थिति को अपनाने वाली राजनीतिक ताक़त को सप्रयास और सचेतन तौर पर प्रचारित करना होगा; सर्वहारा विश्व दृष्टिकोण कोई पूर्वप्रदत्त और स्वयःस्फूर्त नज़रिया नहीं है; यह एक ऐसा नज़रिया है ज़िसे सतत् संघर्ष से हासिल किया जा सकता है। वास्तव में, यही एक कम्युनिस्ट शक्ति का काम है। इसी समझ की रोशनी में हमारा समझना है कि एक वैकल्पिक मीडिया खड़ा करना आज मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के सामने एक बड़ी चुनौती है। मज़दूर वर्ग की अवस्थिति को अपनाने वाले बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों, शिक्षकों और पत्रकारों को ऐसा वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने के लिए आगे आना होगा, जो कि न सिर्फ मज़दूर वर्ग को एक क्रान्तिकारी व्याख्यात्मक चौखटा देता हो, बल्कि परिवर्तनकामी छात्रों, युवाओं, स्त्रियों और जनता के अन्य रैडिकल और जुझारू हिस्सों को एक सही क्रान्तिकारी नज़रिया मुहैया कराये। निश्चित तौर पर, ऐसे संस्कृतिकर्मियों को भी इस सही नज़रिये के लिए सतत् संघर्ष करना होगा, विजातीय विचारों, गैर-सर्वहारा कुसंस्कृति के घटाटोप और शासक वर्गों के प्रचार का हर मौके पर ज़िद के साथ मुकाबला करना होगा। इस वैकल्पिक मीडिया के तौर पर क्रान्तिकारी साहित्य के प्रकाशन गृह खड़े करने होंगे, जनता के अलग-अलग हिस्सों के लिए क्रान्तिकारी अखबार, पत्रिकाएँ आदि प्रकाशित करनी होंगी, क्रान्तिकारी गायन टोलियाँ, नाट्य टोलियाँ बनानी होंगी, परिवर्तनकामी विचारों से लैस फिल्में बनाने के लिए फिल्म प्रोडक्शन हाउस बनाने होंगे, और साथ ही कम्युनिटी रेडिया, नया मीडिया जैसे नये माध्यमों में भी हस्तक्षेप करना होगा। ये सभी माध्यम संघर्ष के स्थान हैं, जहाँ हमें सही सर्वहारा वर्ग अवस्थिति से हस्तक्षेप करना होगा। इस वैकल्पिक मीडिया का एक कार्यभार आज की पस्तहिम्मती और निराशा के घटाटोप को दूर करने के लिए अपनी क्रान्तिकारी विरासत को पुनर्जीवित करना और आम जनता के बीच पेश करना होगा। यानी एक क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया का एक कार्यभार आज के समय में क्रान्तिकारी सर्वहारा पुनर्जागरण का होगा, ताकि जनता को फिर से अपनी ऊर्जा, अपनी शक्ति पर भरोसा पैदा हो। अपने देश और पूरी दुनिया की क्रान्तिकारी विरासत को हमें अपने देश की जनता के सामने पेश करना होगा। लेकिन सिर्फ अपनी क्रान्तिकारी विरासत को पुनर्जीवित करने से आज के युग के गम्भीर प्रश्नों का समाधान नहीं हो सकता है। इसके लिए आज के पूँजीवाद की आर्थिक कार्यप्रणाली, उसकी राजनीति, उसकी संस्कृति, उसके मीडिया और प्रचार पद्धति में आने वाले बदलावों को समझना होगा। इसके बिना मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी शक्तियाँ आज की विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का मुकाबला नहीं कर सकती हैं। यह काम है नये के अन्वेषण का, परिवर्तन के पहलू के सन्धान का, ज़िसे हम क्रान्तिकारी प्रबोधन का नाम दे सकते हैं।

इस नये सर्वहारा क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन के ज़रिये ही हम एक नया क्रान्तिकारी व्याख्यात्मक ढाँचा और अर्थों की व्यवस्था जनता के सामने पेश कर सकते हैं। निश्चित तौर पर, ऐसा कोई भी क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया कभी भी कारपोरेट मीडिया से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकता है। लेकिन इस प्रतिस्पर्द्धा की कोई ज़रूरत नहीं है; यह क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया का लक्ष्य ही नहीं है। इसकी पूरी कार्यपद्धति ही अलग होगी; इसका जनता तक पहुँचने का तरीका अलग होगा; इस कार्यपद्धति में पूँजी का स्थान केन्द्रीय नहीं होगा और न ही यह वेतनभोगियों पर निर्भर करेगा। यह प्रतिबद्ध राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बूते पर चलेगा। इसके ज़रिये यह अपनी पहुँच मज़दूर बस्तियों, निम्न मध्यवर्गीय कॉलोनियों और विश्वविद्यालय कैम्पसों तक बनायेगा। क्रान्तिकारी साहित्य, क्रान्तिकारी संगीत और फिल्मों और ऐसे ही क्रान्तिकारी सांस्कृतिक सामग्री को यह वैकल्पिक मीडिया अपने जनबल के बूते समाज के कोने.कोने तक पहुँचायेगा। इसी के ज़रिये बुर्जुआ विचारधारा के वर्चस्व के ख़िलाफ़ संघर्ष किया जा सकता है, इसी के ज़रिये बुर्जुआ विचारधारा के हमलों के समक्ष हम अपने विचारधारात्मक बैरीकेड खड़े कर सकते हैं, इसी ज़रिये जनता की वर्ग चेतना का क्रान्तिकारी रूपान्तरण किया जा सकता है और इसी के ज़रिये हम अपने उन्नत तत्वों को खोजने, उनके क्रान्तिकारी शिक्षण.प्रशिक्षण का काम कर सकते हैं।

निश्चित तौर पर, ऐसा क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया खड़ा करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन यह आज की एक अहम ज़रूरत है। सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को हाथ में लिये बग़ैर हम आगे नहीं जा सकते हैं। इसके लिए बड़े पैमाने पर क्रान्तिकारी और विशेष तौर पर युवा क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों की ज़रूरत होगी। यह एक लम्बा और जटिल काम है, लेकिन यह अब एक अनिवार्य ज़रूरत बन चुका है। इसके लिए ऐसे सभी प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों को आगे आना ही होगा, ज़िन्होंने जनता का पक्ष चुना है, जो यथास्थिति को स्वीकार करके शासक वर्गों की चाकरी करने के हामी नहीं बने हैं, जो आज के संशयवाद की बयार में नहीं बह रहे हैं और इस सत्य पर उनकी पकड़ ढीली नहीं पड़ी है कि परिवर्तन ही एकमात्र नियतांक है!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

five × three =