राज्य के साथ कला का संघर्ष लेखक तथा उत्तर-औपनिवेशिक समाज के संरक्षक

न्गूगी वा थ्योंगो

एक

इतिहास की दृष्टि से मानव जीवन में कला का जन्म राज्य के उद्भव से पहले हुआ था। राज्य के प्रारम्भिक स्वरूप में उभरने से भी पहले लोग अपने शरीर को सजाते थे, पत्थरों पर चित्र बनाते थे, गीत गाते थे और नृत्य करते थे। राज्य का जो मौजूदा स्वरूप है वह हमेशा से नहीं है। जैसा कि एंगेल्स ने अपनी किताब ‘परिवार और राज्यसत्ता की उत्पत्ति*’ में लिखा है यह परस्पर विरोधी सामाजिक संवर्गों में मानव समाज के विकास का नतीजा है। संघर्षशील सामाजिक हितों से ऊपर एक सत्ता उभरती है जो तटस्थ नज़र आती है। दमनकारी उपकरणों और संस्थाओं से लैस यह सत्ता पूरे समाज को वैसे ही नियंत्रित करती है जैसे सामन्ती युग में कोर्इ पितृसत्तात्मक व्यक्ति अपने कुनबे को करता था। 19वीं सदी के उपनिवेश-पूर्व अमरीका में बहुत सारे ऐसे समुदाय थे जिनमें एंगेल्स की परिभाषा के अनुसार ऐसी किसी विशेष सार्वजनिक सत्ता का विकास नहीं हुआ था जिसे अपने को बनाये रखने के लिए टैक्स लगाने की ज़रूरत थी। इस “विशेष सार्वजनिक सत्ता” की व्यापक तौर पर शुरुआत उपनिवेशवाद ने की ताकि उपनिवेश में रहने वाले लोगों को नियंत्रित किया जा सके और उन्हें उनकी निर्धारित जगह पर रखा जा सके। अर्थात ख़दानों और बागानों में और सैनिक बैरकों, पुलिस, जेल, कालकोठरी और गवर्नरों से लेकर छोटे-छोटे अधिकारियों तक की सम्पूर्ण नौकरशाही का खर्चा निकालने के लिए उन पर भारी टैक्स लगाया जा सके। इससे पहले के समाज, जैसे नाइजीरिया का इबो समुदाय या केन्या का अगीकूयू समुदाय एंगेल्स के स्व प्रेरित सशस्त्र संगठन का स्वरूप लगभग ले चुके थे जिसमें हर आदमी सबकुछ होता था: सिपाही, किसान, सलाहकार, गायक, पुजारी।

राज्य का एक काम यह सुनिशिचत करना होता है कि समाज की विभिन्न शक्तियाँ सामाजिक ताने-बाने में अपनी जगह पर बने रहें। ऐसा वह बलपूर्वक लादे गये नियमों से करता है जिन्हें क़ानून के रूप में संहिताबद्ध भी किया जाता है। जिन समाजों में राज्य नहीं होता था उन्हें बाँधकर रखने का काम संस्कृति करती थी। संस्कृति का क्षेत्र वांछित और अवांछित मूल्यों से तय होता था। ये मूल्य कहानियों, गीतों अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में समाहित होते थे। इस तरह कहानी, नृत्य, उत्सव, रीति-रिवाज और यहाँ तक कि खेलकूद भी नैतिक और आचरणगत आदर्शों के निर्धारण, पुनर्निर्धारण और प्रसारण में एक-दूसरे की मदद करते थे। उदाहरण के लिए ‘फ़ेसिंग माउण्ट केन्य’ में ज़ोयो केन्याटा बताते हैं कि किस तरह राज्यविहीन गिकूयू समाज को संचालित करने वाले नियम भी नृत्य मुद्राओं में सन्निहित हैं।1  और ओकोट पीबीटेक अपनी पुस्तक ‘आर्टिस्ट द रूलर’ में कहते हैं कि कलाकार अपनी आवाज़ का उपयोग ननगा (हार्प) की संगत पर नियमों को गाने के लिए करता है; और ढोल, के ताल पर अपने शरीर को लचका-लचकाकर नियमों को घोषित करता है। वह अपने नैतिक नियमों को लकड़ी और पत्थर पर उकेरता है तथा ”करणीय और अकरणीय” को दीवारों तथा कैनवासों पर पेण्ट करता है।2 राज्य के उदभव के साथ मिली-जुली संस्कृति की सत्ता को राज्य की सत्ता से बदल दिया गया। पर यह पूरी तरह बदला नहीं जा सका।

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अनुवाद : रामकृष्ण पाण्डेय

(परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित न्गूगी वा थ्योंगो की पुस्तक ‘क़लम, बन्दूक की नोक और सपने का अंश’)

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