हान्स आइस्लर – एक नयी संगीत संस्कृति के निर्माता

एक नयी संगीत संस्कृति के निर्माता

हान्स आइस्लर

हान्स आइस्लर महान जर्मन संगीतकार और संगीत चिन्तक थे। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के सर्वाधिक प्रतिभावान युवा संगीतकारों में उन्हें गिना जाता था। लेकिन आइस्लर ने बुर्जुआ विचारधारा और कला-धाराओं को खारिज किया और अपनी सृजनात्मक क्षमताएँ हिटलर-पूर्व जर्मनी में क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग के आन्दोलन को समर्पित कर दीं। इसी दौरान उन्होंने बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के साथ मिलकर काम शुरू किया और यह भागीदारी इन दोनों महान कलाकारों के जीवन-पर्यन्त चलती रही। 1933 में आइस्लर को नाज़ी जर्मनी छोड़ना पड़ा लेकिन उनके संगीत सृजन में या फासिस्ट-विरोधी और प्रगतिशील समूहों के साथ उनके काम में कोई कमी नहीं आयी। अमरीका में दस वर्ष तक निर्वासन में रहने के दौरान उन्होंने  फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया, संगीत शिक्षण किया और व्याख्यान देते रहे। मैकार्थी के दौर में उन्हें वाशिंगटन में हाउस कमिटी ऑन अन-अमेरिकन एक्टिविटीज के सामने बुलाया गया जिसका एक ही उद्देश्य  था, कम्युनिस्टों या उनसे सहानुभूति रखने वालों को प्रताड़ित करना। 1948 में वे यूरोप चले गये और फिर 1950 से मृत्युपर्यन्त पूर्वी जर्मनी में रहे। 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में जब पश्चिम की युवा, प्रगतिशील पीढ़ी ने ब्रेष्ट के बहिष्कार को तोड़ा तो आइस्लर भी वहाँ के संगीत पंडितों के लिए ‘सम्माननीय’ हो गये। ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’ में एक लेख में डेविड ड्रू ने लिखा है: “उनके निबन्धों और व्याख्यानों में द्वन्द्वात्मक पद्धति पर ऐसी महारत और भाषा पर ऐसी पकड़ दिखती है, इतने विस्तृत सन्दर्भ और ऐसी विदग्धता मिलती है कि खुद को याद दिलाना पड़ता है कि वह मूलतः एक संगीतकार थे।” – सम्पादक

संगीत में जो नया है, उसके विविध पहलुओं के साथ उसे परिभाषित करने के लिए यह ज़रूरी है कि संगीत में मौजूद स्थिति का विश्लेषण किया जाये और सर्वोपरि तौर पर, उसका आलोचनात्मक परीक्षण किया जाये। निश्चित ही, ऐसे किसी परीक्षण की दिक्क़तें बहुत अधिक हैं। पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली जिस श्रम-विभाजन पर स्थापित है उसने कला के क्षेत्र में ‘विशेषज्ञ’ और ‘शौकिया’ (एमेच्योर’) के बीच एक खास क़िस्म के विभाजन को जन्म दिया है। इससे संगीत के बारे में वैज्ञानिक ढंग से बात करने की दिक्क़त का पता चलता है। यदि हम कला के बारे में इस तरह से चर्चा करना चाहते हैं कि महज इसका वर्णन करने के बजाय कुछ व्यावहारिक और उपयोगी नतीजे भी निकालें तो यह नितान्त आवश्यक है कि न केवल कला के उत्पादन में, बल्कि कला की अवधारणा में भी वैज्ञानिक पद्धतियों को लागू किया जाये। संगीत के दायरे में विज्ञान को लागू करने में एक खास किस्म की दिक्क़त है कि इसका वर्णन केवल उस व्याख्यात्मक शब्दावली में ही किया जा सकता है जो सांगीतिक तकनीक से पैदा होती है और मुमकिन है कि संगीत की दुनिया का कोई शौकिया आदमी उससे परिचित न हो।

आज यदि हम कला के किसी औसत बुर्जुआ उपभोक्ता से संगीत के बारे में उसके विचार पूछें तो हमें यह उत्तर मिलेगा: संगीत अतिप्राचीन काल से मौजूद है और हमेशा मौजूद रहेगा। यह एक समाजोपरि परिघटना है, जिसकी आंशिक व्याख्या, निश्चित तौर पर, सामाजिक परिस्थितियों द्वारा भी की जा सकती है, लेकिन फिर भी जिसका एक स्वतंत्र चरित्र है। कला-शैलियों में परिवर्तनों की व्याख्या अभिरुचि में परिवर्तनों द्वारा की जाती है। संगीत में परिपूर्णता की एक निश्चित मात्रा होती है, जो मनुष्य से स्वतंत्र रूप में मौजूद रहती है, और जो अन्ततोगत्वा अपना प्रभाव छोड़ती ही है, चाहे भले ही आम तौर पर लोगों को उसका पता न चले। क्योंकि जो सचमुच महान है वह कभी न कभी अपना प्रभाव छोड़ेगा ही। यदि मानव जाति विलुप्त हो जाये तो भी संगीत के महान मूल्य, अपने खुद के अन्तर्निहित नियमों का अनुपालन करते हुए, मानव समाज के बाहर और उसके बावजूद, चिरस्थायी बने रहेंगे।

समाजोपरि परिघटना के रूप में संगीत की यह अवधारणा इन सौन्दर्यशास्त्रीय विचारों तक पहुँचती है: समाज से बाहर और उससे स्वतंत्र एक काल्पनिक ‘हार्मोनी’ मौजूद है, वही वह सांगीतिक आदर्श है जो किसी व्यक्ति द्वारा या किसी कलाकृति-विशेष द्वारा हासिल किया जाता है अथवा नहीं किया जाता है। किसी कलाकृति ने किस हद तक परिपूर्ण ‘हार्मोनी’ अर्जित की है, इसे निर्धारित किया जा सकता है। कला-मूल्यों को निर्धारित करने की पद्धतियाँ अंशतः तकनीकी होती हैं और अंशतः शुद्ध संवेगात्मक (भावनात्मक) होती हैं। फिर भी ये सामान्य पद्धतियाँ होती हैं और इन्हें हरेक व्यक्ति लागू कर सकता है, चाहे वह जिस किसी भी सामाजिक वर्ग का हो।

संगीत और सांगीतिक कृतियों की यही अवधारणाएँ हैं जो आज आम तौर पर, थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ, देखने-सुनने को मिलती हैं। सांगीतिक कर्म से निकाले गये इन विचारों ने संगीत के व्यवहार को कैसे प्रभावित किया है और इसके उलट, संगीत के व्यवहार ने इन विचारों को कैसे प्रभावित किया है? यह मानना पड़ेगा कि इन विचारों ने और अधिक विभ्रम पैदा किया है, क्योंकि यदि एक ही कृति पर अलग-अलग व्यक्ति इन्हें लागू करते हैं तो नतीजे के तौर पर अलग-अलग मूल्यांकन सामने आते हैं। व्यक्तिगत अभिरुचि ही अकेला पैमाना होता है, लेकिन उसे तकनीकी अथवा विचारधारात्मक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता। व्यापक रूप से व्याप्त और अभी भी फलता-फूलता यह विभ्रम स्पष्ट कर देता है कि ये विचाराधीन पद्धतियाँ लागू करने लायक अब लगभग रह ही नहीं गयी हैं। बुर्जुआ संगीत में संकट के सर्वाधिक प्रत्यक्ष संकेतों में से एक है, इसका अराजक चरित्र। प्रचलित सांगीतिक रीतियों-पद्धतियों में परिवर्तन अराजक हैं, कंसर्ट (संगीत-सभा) का व्यवसाय अराजक है, यहाँ तक कि कंसर्ट-जगत में संकट की प्रतिक्रियाएँ भी अराजक हैं। कंसर्ट-संगीत में संकट खास तौर पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान तीखा हुआ है और शायद यह उस भयावह विनाशकारी आपदा के अपेक्षतया अधिक स्पष्ट रूपों में से एक है जो सुव्यवस्थित बुर्जुआ सांगीतिक सम्बन्धों से बर्बरता की अवस्था में संक्रमण की भविष्यवाणी कर रही है। कंसर्ट-जगत में संकट की सर्वाधिक युक्तिसंगत व्याख्या सामाजिक है। मुद्रास्फीति के चलते मध्य वर्ग के अधिकार-वंचित होते जाने और व्यापक निम्न-पूँजीपति वर्ग के बढ़ते सर्वहाराकरण के परिणामस्वरूप, युद्ध-पूर्व की शिक्षा के उस स्तर और संगीत की शिक्षा के भी उस स्तर को बनाये रख पाना असम्भव हो चुका है जिसने कंसर्टों में जाने के चलन को स्थायित्व प्रदान किया था। निम्न-पूँजीपति वर्ग की व्यापक आबादी, नौकरीपेशा लोग और यहाँ तक कि मध्य वर्ग भी ऐसे संगीत पर निर्भर हो चुका है जो कठिन और अनिश्चित आर्थिक स्थितियों के इस समय में सुगमता से तुष्ट करता है। हम सभी ने स्वयं उस तथाकथित हल्के या ज़िंदादिल संगीत के प्रस्फोट को अनुभव किया है जिसकी पहले यह कहकर उपेक्षा की जाती थी कि इसमें गम्भीरता का अभाव होता है। कंसर्ट हॉल या ऑपेरा हाउस जैसी विशेषाधिकार प्राप्त जगहों में भी सबसे सहज-साध्य सांगीतिक आनन्द-जाज-ने घुसपैठ कर ली है। जाज ने श्रोता का इस ढंग से मनोरंजन करना बहुत सम्भव बना दिया है जो जीवन्त तो हो पर जिसमें कोई प्रतिबद्धता न हो, क्योंकि यह श्रोता से किसी तरह का कोई तकाजा नहीं करता। ऐसा सिर्फ जाज में ही नहीं हुआ है कि शुद्ध आनन्द का कार्य, जिसे हमने बुर्जुआ संगीत का कार्य बताया था, एक विशुद्ध उद्दीपक बन जाता है। बुर्जुआ संगीत की महानता के युग में हम आनन्द के साधन के रूप में जिस वेल्टनशाऊंग (विश्व दृष्टिकोण)’* को पाते हैं, वह मृत हो चुका है। अब यह कार्य विशुद्ध रूप से क्षणिक उद्दीपन प्रदान करना भर रह गया है। पिछले पन्द्रह वर्षों में तेजी से बदलते संगीत के फैशनों की केवल इसी तरीके से व्याख्या की जा सकती है। उद्दीपन का असर बहुत जल्दी उतर जाता है और इसलिए बुर्जुआ संगीत के हाल के युग में, जहाँ इसका कार्य वही रहा है, लगातार संगीत की नयी-नयी पद्धतियों की ज़रूरत बनी रही है। यह ज़रूरत समाज में संगीत के कार्य में किसी आम बदलाव से नहीं पैदा हुई है बल्कि यह उसी कार्य, यानी मनोरंजन, को बरकरार रखते हुए बदलाव की चाहत से पैदा हुई है। डेढ़ सौ साल पहले मनोरंजन का एक प्रतिबद्ध चरित्र होता था, उदाहरण के लिए इसका एक वीरोचित चरित्र होता था। लेकिन अब मनोरंजन सिर्फ मजा दिलाने का एक अप्रतिबद्ध उपकरण बन गया है। इसका काम शब्द के पूँजीवादी अर्थ में श्रमशक्ति का पुनरुत्पादन करना रह गया है। यह प्रक्रिया बर्बर रूप धारण करती है, लेकिन इसके बावजूद द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी व्यक्ति के लिए इसका एक प्रगतिशील चरित्र भी है। यह बात समझ में आने लायक नहीं लगती है और इसलिए इसकी थोड़े विस्तार से व्याख्या जरूरी है।

पिछले पन्द्रह वर्षों में संगीत के विकास ने कलाकार के व्यक्तित्व और कलाकृति की स्वतंत्रता के बारे में बुर्जुआ कला की पुरानी जड़ शब्दावली को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है। बुर्जुआ संगीत व्यवसाय का सर्वग्राही चरित्र नष्ट हो गया है। इस संगीत संस्कृति के ध्वंसावशेषों पर एक नई संगीत संस्कृति के लिए मजदूरों के संघर्ष के वास्ते जगह बना दी गयी है। यह नयी संगीत संस्कृति उनकी वर्गीय स्थिति के अनुरूप होगी जो आज एक स्पष्ट शक्ल अख्तियार करने लगी है।

पूँजीवाद में संगीत का व्यवहार और संगीत का उपभोग

काम और अवकाश (leisure) के बीच का तीखा अन्तरविरोध, जो पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की विशेषता है, सभी बौद्धिक गतिविधियों को दो हिस्सों में बाँट देता है-एक वह जो काम की सेवा करती हैं और दूसरी वह जो अवकाश में काम आती हैं। लेकिन अवकाश श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन की एक प्रणाली है। अवकाश की अन्तर्वस्तु काम की अन्तर्वस्तु नहीं हो सकती। अवकाश उत्पादन के हित में गैर-उत्पादन को समर्पित होता है। पूँजीवाद में संगीत व्यवहार के विशिष्ट रूप का यही सामाजिक-आर्थिक आधार है।

पहले मैं आपको सामन्ती युग में संगीत के प्रति दृष्टिकोण और इसके व्यवहार की एक संक्षिप्त रूपरेखा दे दूँ  ताकि सामन्तवाद और पूँजीवाद की अलग-अलग संगीत पद्धतियों का वैषम्य स्पष्ट किया जा सके। सामन्तवाद के युग में हम इन रूपों में संगीत को पाते हैं: शासक यानी ऊपरी तबकों के विशेषाधिकार के तौर पर दरबारों में संगीत, शासित वर्ग को निर्देश और शिक्षा देने के लिए चर्च में संगीत तथा काम के समय गाये जाने वाले गीतों, प्रेम गीतों आदि के रूप में कार्य स्थल तथा आम जीवन में संगीत। लेकिन यह विभाजन यांत्रिक ढंग से नहीं किया जाना चाहिए। समाज के विकास के एक बिन्दु पर चर्च संगीत लोक गीतों को अपनाकर अपने अनुकूल ढाल लेता है जबकि दरबारी संगीत चर्च संगीत की गठन पद्धतियों का इस्तेमाल  करने लगता है। अब हम अपने विमर्श में एक नया शब्द लाते हैं और वह है-संगीत का कार्य। इससे हमारा आशय है संगीत-सृजन का सामाजिक उद्देश्य। सामन्तवाद में छोटे से विशेषाधिकार-प्राप्त वर्ग के लिए संगीत का कार्य था आनन्द और मनोरंजन, उत्पीड़ित वर्ग के लिए इसका कार्य अनुशासनिक था। यहाँ भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारा रुख लचीला हो। क्योंकि संगीत के अनुशासनिक कार्य तक में भी, उदाहरण के लिए सैन्य संगीत में, आनन्द का पहलू होता है। लेकिन विशेषाधिकार-प्राप्त वर्ग के लिए आनन्द ही संगीत का लक्ष्य था; और यही इसका निर्णायक सामाजिक पहलू है।

चर्च के पुरोहितों की निगाह में संगीत तभी तक उचित है जब तक यह ईसाई शिक्षाओं से मेल खाता है और चर्च की प्रार्थनाओं का प्रभाव बढ़ाता है। उनका निर्णय अपने समय के चर्च के व्यावहारिक प्रयोजनों से संचालित होता है। अपने आप में एक उद्देश्य तथा सौंदर्यात्मक आनन्द के रूप में कला की निन्दा की जाती है। मैं अन्तिम वाक्य की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ क्योंकि यह आज संगीत के प्रति बुर्जुआ दृष्टिकोण की पूरी अन्तर्वस्तु को परिभाषित कर देता है। यदि चर्च के पुरोहित आरम्भिक सामन्तवाद के समय से ही इस दृष्टिकोण का विरोध करते थे तो इससे पता चलता है कि उस समय भी शहरी वर्गों के तबके और जागीरदारों के बीच सामाजिक अन्तरविरोध मौजूद था। पुरोहित वर्ग के संगीत के सौंदर्यशास्त्र के प्रति इस उग्र दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य चर्च तथा विधर्मी संगीत के बीच स्पष्ट विभाजन करना था। विधर्मी संगीत में खासकर वर्ण विज्ञानियों (chromatics) को हानिकारक और कमजोर बनाने वाले तत्व कहकर दुत्कारा जाता था। सामन्तवाद में संगीत की अनुमति तभी होती थी जब वह चर्च की सेवा में होता था और वहाँ भी इसकी भूमिका शब्द की तुलना में मातहत की थी। पुरोहित वर्ग का कहना था, “ईश्वर ने मनुष्य को संगीत इसलिए दिया है ताकि उसे भजन आसानी से कंठस्थ हो सकें।” संगीत के ऐन्द्रिक आकर्षण को खत्म नहीं किया जा सकता था लेकिन चर्च ने इसे चर्च की सेविका में तब्दील करके अहानिकर बनाने की पूरी कोशिश की। इसने शब्द पर और गायकों की मनःस्थिति पर बहुत बल दिया लेकिन श्रोताओं पर नहीं। उपरोक्त उद्धरण प्रोफेसर एबर्ट की किताब मध्य युग में संगीत के प्रति रुख (The Approach to Music in the Middle Ages) से लिया गया है। प्रो- एबर्ट आगे बताते हैं कि हर तरह की सुरीली गायकी और किसी भी तरह के अलंकारों की सख्ती से मनाही थी। “धर्मपरायण या बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए अपने गायन में लोच पैदा करना या कठोर स्वर लाना उचित नहीं है। उन्हें संयमित आवाज में ईश्वर की वंदना करनी चाहिए जिससे उनके गायन का प्रभाव संगीत-सृजन का नहीं बल्कि आह भरने जैसा पड़े।” भजनों को कंठस्थ करने में मदद तथा शब्दों के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाने के अलावा संगीत का एक कार्य प्रार्थना सभा में पश्चाताप की भावना जगाना और उसे तीव्र करना भी था। यह विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्र शासक वर्गीय हितों से उद्भूत था और व्यवहार में लागू करने पर सामन्ती सम्बन्धों को और स्थिर बनाने में मदद करता था। पादरी हिरोनाइमस का कहना था, और आपको मानना पड़ेगा कि यह एक विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण हैः  “किसी की आवाज चाहे कितनी भी ख़राब क्यों न हो, यदि उसके कर्म अच्छे हैं तो ईश्वर के समक्ष वह एक अच्छा गायक है। ईसा के सेवकों को गाना चाहिए। गायक की आवाज़ नहीं बल्कि उसके शब्दों से आनन्द मिलना चाहिए।” पवित्र आगस्टस किसी भी ऐन्द्रिक स्वर के विरुद्ध ज़ोरदार चेतावनी देते हैं क्योंकि इससे ईश्वर की ओर से ध्यान भटक सकता है जिसमें गम्भीर पाप का ख़तरा निहित है। व्यावहारिक पुरोहित लोग अपने गायकों को चेतावनी देते हैं कि उनके मनोभाव और उनका आचरण, जो कुछ वे गा रहे हैं, उसकी अन्तर्वस्तु के अनुरूप होना चाहिए, वरना उनका गायन खुद उनके लिए और प्रार्थना सभा के लिए व्यर्थ सिद्ध होगा। आरम्भिक सामन्तवाद में संगीत उत्पादन की कुछ पूर्वशर्तें भी थीं। जैसे, संगीत प्रतिभाजन्य क्षमता की बात नहीं है बल्कि यह सूत्रों का एक योग है जिसे हर कोई हासिल कर सकता है और करना ही चाहिए। और अन्त में, खुद संगीतकार का व्यावहारिक दृष्टिकोण है जो कलाकार के बुर्जुआ विचार से एकदम विपरीत है। उस समय के एक सिद्धान्तकार जोहानेस कॉटनियस ने कहा है, “कलाकार को हमेशा ही उस जनता की विशिष्टताएँ अपने ध्यान में रखनी चाहिए जिसे वह प्रभावित करना चाहता है।”

अब हम चर्च संगीत के कार्य को संक्षेप में इस तरह रख सकते हैं: चर्च में संगीत किसी एक व्यक्ति या उसके व्यक्तिगत भाग्य की ओर लक्षित नहीं है बल्कि इसका कार्य समस्त भागीदारों के आचरण को धार्मिक बनाना है। इस तरह, जब श्रोता को बाद में, समवेत गायन के रूप में संगीत में शामिल होने का मौका मिलता है, तो वह एक तरह के व्यायाम या अभ्यास में भाग लेता है और इस तरह एक विशेष आचरण-व्यवहार के लिए ज्यादा दृढ़ता और प्रभावी ढंग से बाध्य किया जाता है। इस मामले में संगीत में आनन्द एक मातहत तत्व है। संगीत-सृजन का यह रूप जागीरदारों और सामन्तों के वर्ग हितों के अनुकूल था और व्यवहार में इसने बार-बार सामन्तवाद को स्थिर बनाया। इस सामाजिक कार्य से स्वरों के विन्यास की एक विशिष्ट पद्धति निकली जिसे हम सीधे संगीत तकनीक कहेंगे।

मध्य युग में संगीत रचना की तकनीक इस प्रकार थी: सांगीतिक विचारों की प्रस्तुति बहुस्वरात्मक (polyphonic) थी। शास्त्रीय संगीत से पहले की बहुस्वरता में कोई वैषम्य नहीं था, न तो लय व गति में और न ही स्वरों के विन्यास में। इस तकनीक की विशिष्टताओं में से एक है विविधता का अभाव। यह विविधता विषय की है जो इसके विकास को सम्भव बनाती है। संगीत के विषय को विभाजन द्वारा, आवृत्ति द्वारा या आगे बढ़ाकर परिवर्तित नहीं किया जाता और न ही उन्नीसवीं शताब्दी के शास्त्रीय संगीत की तरह इसे विकसित किया जाता है। सांगीतिक विकास अन्य आवाजों में जोड़कर हासिल किया जाता है। आम तौर पर यह बहुस्वरात्मक प्रस्तुति का सार है क्योंकि कोई बन्दिश या नकल किसी उस संगीत विचार को विकसित करना ही होता है। ऐसा इसे विभिन्न स्तरों पर, विभिन्न स्वरमानों के साथ और विभिन्न समयों में गाकर या बजाकर किया जाता है।

वाद्य संगीत रचना बुर्जुआ अर्थ में वाद्य संगीत रचना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से अलग-अलग हिस्सों की रचना है जिसमें न तो रंग है और न ध्वनि प्रभाव। वादन एक हद तक एकरूप स्वर में किया जाता है। उत्कर्षी आरोह और अवरोह नदारद होते हैं। स्वराघात परिवर्तन की कमी होती है। इससे हम देख सकते हैं कि कैसे एक निश्चित सामाजिक स्थिति एक निश्चित संगीत तकनीक को जन्म देती है और यह तकनीक व्यवहार में लागू किये जाने पर इस सामाजिक स्थिति की मदद करती है।

सामन्तवाद की गोद में पल रहा बुर्जुआ वर्ग सामन्ती उत्पादन प्रणाली का विरोधी होता है। पहले मैं इस सामाजिक अन्तरविरोध की आर्थिक दायरे में व्याख्या कर दूँ ताकि हम संगीत जैसे मुश्किल क्षेत्र में इसे स्पष्ट कर सकें। इनमें से एक अन्तरविरोध था मैन्युफैक्चर और भूमि लगान के बीच। सामन्ती भूमि लगान से मुनाफे का स्रोत एक विशिष्ट सामाजिक ढाँचा- भूदास प्रथा में होता है। लेकिन पूँजी के अस्तित्व की ऐतिहासिक पूर्वशर्तें क्या हैं? जैसा कि मार्क्स ने लिखा है: “पूँजी के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक पूर्वशर्तों में पहली है कुछ व्यक्तियों के हाथों में निश्चित मात्रा में धन का संचय, एक ऐसे समय में जब, समग्र रूप में, माल उत्पादन का स्तर अपेक्षाकृत ऊँचा हो; और दूसरी पूर्वशर्त है ‘मुक्त’ श्रम की मौजूदगी। इस ‘मुक्ति’ का दोहरा अर्थ है। पहला यह कि मज़दूर अपनी श्रमशक्ति बेचने के लिए हर तरह के बन्धनों और सीमाओं से मुक्त है, और दूसरा यह कि वह भू सम्पत्ति और उत्पादन के साधनों से भी पूरी तरह मुक्त है। जैसा कि मार्क्स व्यंग्य के साथ कहते हैं, वह एक ऐसा मज़दूर है जो ‘‘पक्षी की तरह मुक्त है”।**

इस आर्थिक अन्तरविरोध से युवा बुर्जुआ वर्ग का भूदासता के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष जन्म लेता है। यह मानवाधिकारों की खोज तक ले जाता है।

सामन्तवाद के तहत एक अन्य आर्थिक अन्तरविरोध मुक्त व्यापार और भू सम्पत्ति पर सामन्ती विशेषाधिकार के बीच था। इस सिलसिले में मैं ‘काउत्स्की’ के एक आरम्भिक लेख का सहारा लूँगा- यह उनकी युवावस्था के दिनों का है, आज तो वह बहुत बदल चुके हैं। यह व्यापार के लिए शराब के एक पीपे को एमियंस से पेरिस ले जाये जाने से सम्बन्धित है। मान लें कि एमियंस में शराब के इस पीपे की कीमत 20 फ्रैंक बैठती है। लेकिन पेरिस में यह 50 फ्रैंक का पड़ेगा क्योंकि पीपे को ले जा रही गाड़ी को कई सड़कों से गुजरना पड़ता है जिन पर सामन्तों को तथाकथित चुंगी वसूलने का अधिकार है। सामन्त बिना कोई पूँजी निवेश किये, अपने वर्ग के पैतृक विशेषाधिकार की बदौलत सिर्फ सड़कों पर चुंगी वसूलकर मुनाफा कमा सकता था। सामन्तों की राय में ये विशेषाधिकार ईश्वर प्रदत्त थे। उद्यमी युवा लोगों का स्वतंत्रता का विचार इसका विरोधी था। स्वतंत्रता का यह आर्थिक विचार स्वतंत्रता की राजनीतिक अवधारणा से भी मेल खाता है जो फ्रांसीसी क्रान्ति में ‘राइट्स आफ मैन’ के रूप में अभिव्यक्त हुई। यानी हर सामाजिक ढाँचे का उद्देश्य तीन प्राकृतिक एवं अलिखित मानवाधिकारों की रक्षा करना है। ये तीन अधिकार हैं स्वतंत्रता, सम्पत्ति एवं सुरक्षा और निरंकुशता का प्रतिरोध। यहाँ हमारे सामने इस बात का शानदार उदाहरण है कि किस तरह आर्थिक हित राजनीतिक रूप ग्रहण करते हैं और राजनीतिक रूप किस तरह वेल्टनशाऊंग में ढलकर अनमनीय चरित्र अख्तियार कर लेते हैं। ये सामान्य सिद्धान्त इसी रूप में सामान्य हैं कि वे पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को सामान्य रूप से सम्भव बनाते हैं। लेकिन यह व्यवहार में लागू कैसे किये गये? निरंकुशता के प्रतिरोध के अधिकार को जल्दी ही तिलांजलि दे दी गयी । सिर्फ सम्पत्ति का अधिकार बचा रह गया और इसका मतलब था बुर्जुआ अर्थ में व्यक्तिगत सम्पत्ति। आज, यानी 1931 में, उद्यमियों की आर्थिक स्वतंत्रता का यह विचार अब स्वतंत्रता की एक राजनीतिक अवधारणा से मेल खाता है जो उदाहरण के लिए, वाइमार संविधान में अभिव्यक्त होती है। उदाहरण के लिए यह कहता है, “प्रत्येक जर्मन का आवास एक आश्रयस्थल है और अनुल्लंघनीय है।” यहाँ यह जोड़ना जरूरी है कि आवास आश्रयस्थल और अनुल्लंघनीय बने इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति के पास आवास हो या उसका खर्च उठाने की क्षमता हो। और उससे ऐसा कोई राजनीतिक अपराध नहीं होना चाहिए कि घर की तलाशी का वारंट जारी हो जाये। स्वतंत्रता की यह अवधारणा वाइमार संविधान में आगे कहती है: “प्रत्येक जर्मन को जमीन का एक टुकड़ा हासिल करने का अधिकार है।” यहाँ मैं जोड़ना चाहूँगा कि 99 प्रतिशत जर्मन जनता इस अधिकार का प्रयोग करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि इसके लिए आवश्यक मुद्रा का अभाव है। आर्थिक हितों से निर्देशित और व्यवहार में लागू स्वतंत्रता की यह अवधारणा भी कुछ निश्चित आर्थिक सम्बन्धों को सम्भव बनाती है। यह बुर्जुआ कला उत्पादन, कला व्यवहार और इसलिए स्वाभाविक रूप से बुर्जुआ संगीत का आधार भी है। सामन्तवाद के तहत महान सांगीतिक संघर्ष “सच्चे संगीत के लिए संघर्ष” के झण्डे तले शुरू हुए जो सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के तीखे संघर्ष को अभिव्यक्त करता था। इस संघर्ष के आरम्भ में बुर्जुआ वर्ग चर्च के साथ सीधे विरोध की स्थिति में था और इसलिए संगीत के सामन्ती कार्य का भी विरोधी था। संगीत का सामन्ती कार्य सभा में पश्चाताप की भावना जगाने और उसे तीव्र करने के सामाजिक उद्देश्य को सम्भव बनाना था लेकिन बुर्जुआ समाज में इसका नया कार्य निजी व्यक्तित्व के सुसंगत विकास में मदद करना है और यह सामन्ती कार्य के प्रत्यक्ष विरोध में है।

बुर्जुआ संगीत का यथासम्भव ठोस ढंग से वर्णन करने के लिए हमें कहना होगा कि “माल” शब्द जो पूँजीवाद में निर्णायक कारक है, संगीत के दायरे में भी फैल चुका है। कंसर्ट का रूप संगीत में माल सम्बन्धों के प्रवेश का द्योतक है। कंसर्ट के टिकटों की बिक्री, संगीत की स्वरलिपियों की बिक्री, संगीत विशेषज्ञ-संगीत के मालों के उत्पादक ये सब इसी की आभिलाक्षणिक विशेषताएँ हैं।

बुर्जुआ वर्ग का शास्त्रीय कंसर्ट संगीत, संगीत के मालों के खरीदार को लक्षित है और इसका उद्देश्य उसी का मनोरंजन करना है। यह स्पष्ट है कि एक ऐसी सामाजिक अवस्था में जो खुद को व्यक्ति की स्वतंत्रता (यानी उद्यमी की स्वतंत्रता और आर्थिक शक्तियों की स्वतंत्रता) के प्रमाण के रूप में पेश करती है, अब संगीत का वैसा कोई प्राकृतिक कार्य नहीं है जैसा सामन्ती समाज में था। कंसर्ट का यह रूप प्रत्यक्षतः तो सांगीतिक मनोरंजन के सामन्ती विशेषाधिकार का बिल्कुल विरोधी दिखायी देता है। लेकिन नजदीक से परीक्षण करने पर साफ हो जाता है कि यह सम्पत्ति के विशेषाधिकार का एक अपेक्षाकृत अधिक जनतांत्रिक स्वरूप मात्र है। कारण यह कि चर्च के कंसर्ट को जहाँ सिर्फ सामन्ती श्रोता ही सुन सकते थे, वही कंसर्ट के बुर्जुआ रूप में एक विशिष्ट पूर्वशर्त सामने आती है। यह है शिक्षा और प्रारम्भिक संगीत शिक्षा की शर्त। क्योंकि बुर्जुआ संगीत भी सार्वभौमिक संगीत नहीं बल्कि शासक वर्ग की कला है। बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच वैषम्य जितना ही बढ़ता जाता है, संगीत में भी यह स्पष्ट वैषम्य उतना ही बढ़ता जाता है और पूँजीवाद के तहत यह चरम पर पहुँच जाता है। इस वैषम्य को आम तौर पर सरल और कठिन संगीत के अन्तर के रूप में रखा जाता है। यह भी दावा किया जाता है कि यह अन्तर गम्भीर और अगम्भीर संगीत का या गम्भीर और सुगम संगीत का है। लेकिन ये सारे लेबल इस तथ्य को नहीं छिपा सकते कि यह अन्तरविरोध एक सामाजिक अन्तरविरोध से पैदा हुआ है। एक समय समस्त सांगीतिक विकास का ध्वजवाहक चर्च संगीत आज पृष्ठभूमि में धकेला जा रहा है। यह अब सामाजिक रूप से निर्णायक कारक नहीं रह गया है। इसका तकनीकी विकास कंसर्ट संगीत से निःसृत है और इस तरह इसका सामन्ती कार्य भी बदल रहा है। बर्गर भी चर्च जाता है, क्योंकि वह चर्च से अपना झगड़ा काफी पहले खत्म कर चुका है और अब चर्च की विचारधारा का इस्तेमाल मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ उसी तरह करता है जिस तरह सामन्तवाद ने इसका इस्तेमाल बुर्जुआ वर्ग के ख़िलाफ़ किया था। आनन्द देने के संगीत के बुर्जुआ कार्य, निजी व्यक्तित्व के सुसंगत विकास और उत्थापन के कार्य से उन्नीसवीं शताब्दी में एकस्वरीय (homo-phonic) संगीत का व्यापक विकास हुआ। आरम्भिक क्रान्तिकारी व्यक्ति इस बुर्जुआ संगीत विकास के शुरुआती दौर में अभिव्यक्ति पाता है। इस दौर को हम अठारहवीं सदी के मध्य में मैनहाइम स्कूल से मान सकते हैं। बुर्जुआ संगीत अपने उच्चतम शिखर पर बीथोवेन की सिम्फनियों में पहुँचा जिनमें आनन्द को फिर से एक तरह के दार्शनिक विश्व दृष्टिकोण से जोड़ा गया। जहाँ क्रान्तिकारी दौरों का क्रान्तिकारी बुर्जुआ संगीत सामन्तवाद के विरुद्ध संघर्ष में महान क्रान्तिकारी व्यक्ति को प्रतिबिम्बित करता है, वहीं उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक यह निराश और सम्पत्ति बचाने में जुटे निम्न पूँजीपति वर्ग को भी प्रतिबिम्बित करने लगा। उदात्त भाव तुच्छतर और निम्नतर होते गये, वे अधिकाधिक अन्तरंग होते गये। बुर्जुआ वर्ग के पराभव और उभरते सर्वहारा वर्ग के विरुद्ध इसका आक्रामक रवैया आनन्द को उत्तरोत्तर अपने आप में एक लक्ष्य बनाता गया, जो अधिकाधिक जटिल और मूल्यहीन था। ऊँचा स्थान पा चुके समकालीन बुर्जुआ कलाकार अत्यन्त महत्वपूर्ण और दंभी हो गये और सिर्फ एक छोटे अभिजात वर्ग के लिए माल उत्पादन करने लगे। कुछ कलाकार तो सिर्फ एक माल के उत्पादन में लग गये।

बुर्जुआ संगीत का यह विशिष्ट कार्य संगीत रचना की एक विशिष्ट तकनीक- एकस्वरता से मेल खाता है। यह बुर्जुआ शास्त्रीय संगीत के सांगीतिक विचारों की प्रस्तुति का ढंग है। यह वैषम्य को सर्वप्रथम और सर्वोपरि रखने के सिद्धान्त पर निर्मित हुआ है। यह सिद्धान्त उच्च स्तर की विविधता और मनोरंजन की गारंटी करता है। हार्मोनी के विकास और इसकी सैद्धान्तिक निष्पत्तियों ने वैषम्य (कंट्रास्ट) की नयी-नयी पद्धतियों को सम्भव बना दिया है। इसके अलावा वाद्य संगीत-विन्यास (इंस्ट्रूमेंटेशन) की तकनीक से भी कंट्रास्ट सुनिश्चित हो जाता है जिसने प्रस्तुति के सांगीतिक साधन के रूप में ‘हैम्बर’ (एक विशेष ध्वनि-रूपक- अनु.) का प्रयोग शुरू किया है। वादन बेहद जीवन्त हो जाता है, आरोह-अवरोह के बारीक सोपान सामने आते हैं। यह शैली निजी अनुभव और निजी कल्पना को अपील करने के लिए अन्य किसी से भी ज्यादा उपयुक्त है। श्रोता को एक पूर्वनिर्धारित रुख अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जाता बल्कि उसे उद्दीप्त करने, उसका मनोरंजन करने और उसके लिए सम्बन्ध निर्मित करने की कोशिश की जाती है।

विकास की यह प्रक्रिया अन्य सभी कलाओं में पायी जाती है। यह विज्ञान में भी पायी जाती है। चर्च संगीत से कंसर्ट संगीत की तरह के ही विकास का एक उदाहरण है मध्य युग के स्कालेस्टिक दर्शन से अठारहवीं शताब्दी के विश्वकोषवादियों और आधुनिक बुर्जुआ दर्शन तक का विकास। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ तक बुर्जुआ संगीत में एक हद तक सर्वग्राही दृष्टिकोण था, एक तरह का सांगीतिक विश्व दृष्टिकोण था। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में बुर्जुआ संगीत में तीव्र संकट उसी समय उत्पन्न हुआ जब पूँजीवाद में संकट की शुरुआत हुई थी। मार्क्स ने अस्सी वर्ष पहले ही सभी राष्ट्रों के संकट के रूप में इस संकट की असाधारण तीव्रता की भविष्यवाणी कर दी थी, और आज हम इसे अपने सामने देख रहे हैं।

बुर्जुआ संगीत में व्याप्त अराजकता का चित्रण करने के लिए हमें उन अलग-अलग धाराओं को स्पष्ट करना होगा जो एक-दूसरे के साथ तीखे द्वन्द्व में उलझी हुई हैं। जर्मनी में संगीत आन्दोलन का दाहिना बाजू- जिसका प्रतिनिधित्व राबर्ट शुमैन द्वारा लीपजिग में शुरू की गई जाइट्शरिफ्रट फुर मुजिक पत्रिका करती है- वैग्नर से रिचर्ड स्त्रास तक के समय का प्रतिनिधित्व करता है। वे बुर्जुआ संगीत के उस सर्वग्राही चरित्र के लिए अंतिम और कमजोर से योद्धा हैं, जो लगभग खत्म ही हो चुका है। वे गेब्रॉचमुजिक2 का विरोध करते हैं, और व्यक्ति की आत्मा को झकझोरने और उसकी आत्मिक समृद्धि का, विश्व दृष्टिकोण वाली सिम्फनियों और सिम्फानिक रचनाओं का समर्थन करते हैं। वे बायें बाजू की तकनीकी प्रगति को खारिज करते हैं और मानते हैं कि एक छोटे ऐतिहासिक युग के मूल्य, शाश्वत हैं। राजनीतिक रूप से वे भी एक अधिक शक्तिशाली, युद्ध पूर्व के साम्राज्यवादी जर्मनी की कामना करते हैं, जो होहेनजोलर्न के नेतृत्व में हो तो और भी अच्छा हो। वे कंसर्टों के पक्ष में हैं; वे 1880-1914 की संगीत की स्थिति को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। इस दायें बाजू का विशुद्ध पेशेवर स्तर बहुत नीचे है। मुख्यतः उनके पास संगीत के बारे में पुरानी पड़ चुकी धारणायें हैं और व्यापक निम्न पूँजीवादी जनसाधारण से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह स्थिति, वास्तविक संकट के बावजूद, उन्हें एक स्थिर सांगीतिक स्थिति के भ्रम में बनाये रखती है। यह उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में बुर्जुआ संगीत के उस रुख की पैरोडी भर है, जो कम से कम उत्पादक तो था। उनके सबसे काबिल चिन्तकों में से एक, हाइनरिख शेंकर तो विरोध में चले गये हैं क्योंकि वह सिर्फ शुबर्ट तक के संगीत को मंजूर करते हैं। संगीत के प्रश्नों पर यह दायाँ बाजू कितना राजनीतिक है, यह सिद्ध करने के लिए (यानी हम अभिशप्त द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी ही घृणित रूप से राजनीतिक नहीं हैं) मैं शेंकर की किताब संगीत के नये सिद्धान्त से उद्धृत कर रहा हूँ: “विश्व युद्ध का अन्त हुआ तो जर्मनी रणक्षेत्र में अविजित रहा, पर जनतांत्रिक पार्टियों ने उसके साथ विश्वासघात किया। ये पार्टियाँ जो हैं औसत दर्जे के लोगों की, अर्द्धशिक्षितों और अशिक्षितों के बेलगाम व्यक्तिवाद की, संयोजन की अक्षमता की, गैरजिम्मेदार मतवाद और रक्तपिपासु प्रयोगवाद की, जिनके साथ जुड़ा है आतंक, जनसंहार, धोखाधड़ी, जनता के बारे में झूठ, पश्चिम की नकल; और जिन्होंने हमारे दुश्मन पश्चिमी लोगों से स्वतंत्रता के उनके रूप का झूठ अपना लिया है। इस तरह कुलीनतावाद का आखिरी प्राचीर भी ढह गया है और प्रकृति खुद को जनतंत्र के सामने छली हुई पा रही है। जनतंत्र जो कि बुनियादी और अवयवी रूप से प्रकृति का शत्रु है। क्योंकि संस्कृति चयनात्मक होती है, मेधा की चमत्कारी उपलब्धियों के आधार पर होने वाला अगाधतम संश्लेषण।”

यह दायाँ बाजू, जिसमें निश्चित रूप से विभिन्न रंगतें और मत शामिल हैं, उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ संगीत को बरकरार रखने और प्रचारित करने के लिए एक हताश संघर्ष चला रहा है। सिद्धान्त रूप में, वे हर नयी बात का विरोध करते हैं।

बुर्जुआ संगीत के मोर्चे के केन्द्र का प्रतिनिधित्व मुजिकब्लैटर डेस आनब्रुच जैसे पत्रों या फ्रैंकफुर्टर जाइटुंग और बर्लिनर टेगब्लैट जैसे दैनिक अखबारों के संगीत स्तम्भों द्वारा होता है। राजनीतिक रूप से वे मोटा-मोटी डायचे स्टाटपार्टी4 से लेकर डायचे वोक्सपार्टी 5 या जे़ंट्रम पार्टी 6 तक के करीब हैं। यह समूह भी पुराने दिनों की याद में आहें भरता है लेकिन यथार्थ के प्रति अन्धा नहीं है। यह संकट को पहचानता है और एक हद तक परम्परा और प्रगति को मिलाने की कोशिश करता है। यह बीथोवेन और स्कूल (एक रूप में घराना-अनु.) संगीत का समर्थक है। यह विदेशी प्रभावों को शामिल करने का समर्थन करता है, यह आर्नल्ड शोनबर्ग तक को मंजूर कर सकता है और यह मजदूरों के संगीत आन्दोलन के भी एक सुधरे हुए रूप के पक्ष में है। यह आशा करता है कि हर चीज व्यक्तिगत मेधा की सृजनात्मक क्षमता और उनकी कृतियों की ऊँची गुणवत्ता से उपजेगी। इस समूह ने शेंकर के इस मत को भी अपना लिया है कि संस्कृति चयनात्मक होती है, वह मेधा की चमत्कारी उपलब्धियों के आधार पर होने वाला अगाधतम संश्लेषण है। लेकिन यह समूह विकास को स्वीकार करता है और सबसे बढ़कर यह संगीत की समृद्धि का पक्ष लेता है। इस धारा के प्रतिनिधियों की राय में, जो वास्तव में अच्छा है वह अपनी जगह बना ही लेगा और अच्छा आधुनिक संगीत इसमें शामिल होगा। जो अच्छा है वह बस अच्छा है। इस समूह के सैद्धान्तिक हिरावल अपने आप से यह नहीं पूछते कि वे अपने मूल्य कहाँ से लेते हैं और न ही वे समाज में संगीत के स्थान के बारे में सवाल करते हैं।

बुर्जुआ संगीत आन्दोलन का बायाँ बाजू सबसे दिलचस्प है। यह यथार्थ पर प्रतिक्रिया करने में सबसे संवेदनशील और तेज है। यह अत्यन्त बहुमुखी है और मेलोस पत्र तथा स्त्रविंस्की एवं हिण्डेमिथ जैसे संगीतकार इसके प्रतिनिधि हैं। आप यहाँ तक कह सकते हैं कि वे बुर्जुआ संगीत के पतन के हिरावल हैं और तकनीकी रूप से इसका सर्वाधिक प्रगतिशील बाजू। आर्नल्ड शोनबर्ग जैसे संगीतकार को भी इस समूह में गिना जाना चाहिए। इस बाजू ने कंसर्ट-जीवन में संकट के प्रति अत्यन्त जीवन्त प्रतिक्रिया की है। चूंकि यथार्थ ने आनन्द के एक साधन के रूप में वेल्टनशाऊंग के सांगीतिक कार्य का अन्त कर दिया है, तो यह समूह एक कदम और आगे बढ़ गया। उन्होंने कहा कि संगीत को विश्व दृष्टिकोण को अभिव्यक्त नहीं करना चाहिए- हालाँकि यह बुर्जुआ वर्ग का एक प्रगतिशील विचार था-और स्पाइलफ्रायड7 तथा ग्रेब्रॉशमुजिक8 जैसे शब्द ढूंढ निकाले। इस तरह अप्रतिबद्ध मनोरंजन को प्रगति में गिना गया और यह स्वीकार्य हो गया। संगीत को महज सुरों का खेल होना चाहिए, इसे मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं करना चाहिए। एक नयी कला मर्मज्ञता पैदा हुई, एक नयी आत्मिकता, एक नया लालित्य और एक नया अप्रतिबद्ध उल्लास। संगीत की रचना इस तरह होनी चाहिए ताकि इसमें तुच्छता, दयनीयता और उदारता को जगह न मिले। आदर्श रूप से तो सबसे अच्छा होता कि यह ठण्डा हो और श्रोताओं के भीतरी भावों में हलचल न पैदा करे। जैसा कि वर्षों पहले स्त्रविंस्की ने कहा था-“सबसे अच्छा तो यह होता कि यह सिलाई मशीन की तरह चले।” पिछले दो वर्षों में, जर्मनी में तीव्र संकट के दबाव में इस बायें बाजू में जबर्दस्त बदलाव आया है और इसने एक बार फिर संगीत की आत्मा और एक नयी गीतिमयता को पा लिया है।

बर्लिन में स्पीलफ्रायड के सूत्रधार पाल हिण्डेमिथ ने अपनी गीति कथा अनवरत का पहला प्रदर्शन देखा। यह गीति कथा एक उत्सुकता जगाने वाली रचना है क्योंकि यह दिखाती है कि बुर्जुआ वर्ग अपने सबसे गहरे संकट के समय में नये उद्दीपन की खोज में अपने विश्व दृष्टिकोण की ओर लौट रहा है। एक पतनशील दौर में नये उद्दीपन की तलाश में उस विश्व दृष्टिकोण को फिर से सामने लाया जा रहा है। और इसलिए शेंकर एवं न्यू जाइट्शरिफ्रट फुर मुजिक से लेकर स्त्रविंस्की, हिण्डेमिथ और बर्लिनर टेगब्लैट तक ने मिलकर एक मोर्चा बना लिया है। लेकिन संगीत में बुर्जुआ वर्ग के इस संयुक्त मोर्चे की राह में कोई चीज खो गयी और हमेशा के लिए नष्ट हो गयी। अतीत में बुर्जुआ कलाकार एक पूर्ण और भरा-पूरा व्यक्तित्व होता था। पर वर्तमान समय में स्त्रविंस्की और हिण्डेमिथ जैसे हमारे संगीतकार इस बारे में काफी अनिर्णय में हैं कि उन्हें कैसी रचना करनी है। स्त्रविंस्की की प्रायः हर कृति या कृतियों का समूह एक भिन्न शैली में है। आधुनिक बुर्जुआ कलाकार बुर्जुआ व्यवस्था की बुनियाद की तरह ही लड़खड़ा रहा है। और इसीलिए यह नवीनतम उपलब्धि, बुर्जुआ संगीत का संयुक्त मोर्चा भी एक लड़खड़ाती हुई एकता ही है।

बड़े पूँजीपति वर्ग के संगीत आन्दोलन के इन तीन समूहों के मुकाबले जोडी8 के नेतृत्व वाले लोक संगीत आन्दोलन और सामाजिक जनवादियों की संगीत सम्बन्धी गतिविधियाँ हैं। व्यवहार में उनका सरोकार मुख्यतः पुराने चर्च संगीत और लोक संगीत का परिष्कार करने से है। इसके पीछे वास्तविक राजनीतिक कारण भी हैं। मैं यहाँ जोडी का सिर्फ एक वाक्य उद्धृत करना चाहूँगा: “लोक गीतों को पुनर्जीवित करके युवाओं को राजनीति से दूर ले जाओ।” सामाजिक जनवादियों की सुधारवादी गतिविधियाँ बुर्जुआ-जनतांत्रिक केन्द्रवादी समूह की कमजोर नकल मात्र हैं। वे कंसर्ट संगीत और जोडी के, स्त्रविंस्की और रिचर्ड स्त्रस के हिमायती हैं। दरअसल वे हर चीज की हिमायत करते हैं। वे सोचते हैं कि संगीत के किसी किस्म के रहस्यमय प्रभाव से काफी कुछ निकलेगा। मंत्रालय के सलाहकार प्रोफेसर केस्टनबर्ग9 की सबसे उल्लेखनीय सलाह यह है कि मज़दूर को “खुलकर गाने” के जरिये खुद को मुक्त करना चाहिए। इस सुधारवादी मजदूर संगीत आन्दोलन के भीतर एक बायाँ बाजू भी है- यह मज़दूरों द्वारा गठित विरोध पक्ष है। लेकिन हाल में उनमें से कुछ को डी-ए-एस-बी- यानी जर्मन वर्कर्स कोरल सोसायटी जैसे मज़दूर वर्ग के बड़े संगीत संगठनों से बाहर निकाल दिया गया है। सुधारवादियों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक नहीं बल्कि औपचारिक कारणों से निकाला गया है। सम्भवतः विरोधी पक्ष ने किसी मौके पर किसी नियम का उल्लंघन किया था जिसका फायदा उठाकर मज़दूरों के संगीत आन्दोलन के सबसे जीवन्त और सबसे प्रगतिशील हिस्सों को उनके ही संगठनों से बाहर कर दिया गया।

संगीत की सम्भावनाएँ क्या हैं, किस वर्ग में नयी पद्धतियों की रचना होगी, कौन सा वर्ग जीवन और कला के बीच, व्यवहार और सिद्धान्त के बीच नये सम्बन्धों की रचना करेगा? अपनी आर्थिक स्थिति के चलते किस वर्ग की संगीत के एक नये कार्य में अत्यन्त फौरी रुचि है। नया संगीत भौतिक क्रान्ति के ज़रिये नहीं जन्म ले सकता, यह केवल उन सामाजिक परिवर्तनों के ज़रिये पैदा होगा जिनमें एक नया वर्ग सत्ता सम्हालेगा और जिनमें कला का भी एक नया सामाजिक कार्य होगा। वैज्ञानिक पद्धतियों को लागू करने पर इस प्रश्न का उत्तर मिलता है। क्रान्तिकारी सर्वहारा वह एकमात्र वर्ग है जिसे नयी पद्धतियों की ज़रूरत है और जिसके लिए संगीत के कार्य में परिवर्तन एक अनिवार्य आवश्यकता है। सत्ता के लिए संघर्ष और समाजवाद के निर्माण की प्रक्रिया में वे व्यवहार के दौरान नयी पद्धतियाँ   तलाशेंगे- और कुछ पा भी ली गयी हैं। इनमें एक समाजवादी संगीत संस्कृति की पद्धतियों के पहले आधार भ्रूण रूप में मौजूद हैं। इस विकास को पूरी तरह समझने के लिए मज़दूरों के संगीत आन्दोलन के इतिहास की संक्षिप्त रूपरेखा देना ज़रूरी है।

मज़दूरों का संगीत आन्दोलन

मज़दूरों के बीच संगीत रचना की पहली अवस्था बुर्जुआ वर्ग की तुलना में इसके “उच्च सांस्कृतिक स्तर के लिए नहीं बल्कि उनके द्वारा संगीत के मौलिक प्रयोग के लिए उल्लेखनीय है। निश्चित रूप से, संगीत समितियों (सोसायटियों-अनु-) का रूप बुर्जुआ वर्ग से लिया गया था लेकिन मेहनतकश लोगों के पहले संगीत संगठनों और बुर्जुआ संगठनों में बुनियादी अन्तर थे। मुख्य अन्तर तो यह था कि 1860-70 के आसपास जर्मनी में बनने वाली मज़दूरों की पहली वृंदगान मंडलियों (कोरल सोसायटियों-अनु-) के सामने एक वास्तविक राजनीतिक कार्यभार था। समाजवाद विरोधी कानूनों के तहत गैरकानूनी राजनीतिक संघर्ष के दौर में वे राजनीतिक गतिविधि के लिए एक आवरण के समान थीं। प्रकटतः विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन के जुझारू चरित्र का पता इसी बात से चलता है कि गठन के तुरन्त बाद ही उनपर पुलिस की निगरानी लगा दी गयी और अन्ततः उन्हें दबा दिया गया। यह हमें संस्कृति के प्रति सर्वहारा के क्लासिकीय रुख की शिक्षा देता है। अवकाश के ज़रिये- यहाँ संगीत गतिविधियों के ज़रिये- श्रमशक्ति का पुनरुत्पादन करने की बाध्यता के चलते ये सांस्कृतिक संगठन तत्काल ही मज़दूरों की वर्गीय स्थिति में खिंच आते हैं और जुझारू चरित्र अख्तियार कर लेते हैं। ठीक यही चीज उनके लिए यह असम्भव बना देती है कि वे खुद को सिर्फ बुर्जुआ लाइडरटाफेल साहित्य तक सीमित रखें जो सिर्फ व्यक्ति के प्रकृति से सम्बन्ध, प्रेम, Gemütlichkeit, विनोदशीलता आदि का चित्रण करता है। अपने संगठन की हिफाजत करने की बाध्यता से उन्हें आक्रामक रुख अपनाना होता है जो सांस्कृतिक मामलों में आन्दोलन और प्रचार के रूप में सामने आता है। इसी ने आगे चलकर संगीत के एक विशिष्ट रूप टेंडेंजलाइड (Tendenzlied) को जन्म दिया।

उत्पादन प्रक्रिया में एकतरफा तौर पर जुटे रहने के कारण मज़दूर अभी तक इस स्थिति में नहीं थे कि खुद ही सांस्कृतिक रूप से प्रभावी हो सकें। उस समय उन्होंने संगीत की नयी दिशा तो नहीं स्थापित की पर उन्होंने एक नयी  पद्धति ज़रूर शुरू कर दी। जहाँ तक उनकी सांगीतिक सामग्री का सवाल है, बुर्जुआ सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह एक ऐसी शैली थी जिसे बुर्जुआ वर्ग के उन्नत तबकों द्वारा पुराने ढंग का और हास्यास्पद माना जाता था। अगर किसी ने 1880 में यह कहा होता कि मज़दूरों के ये कुछ बेढंगे से और खुल्लमखुल्ला ‘लाल’ गीत वे साधन थे जिनके द्वारा मज़दूर जर्मन शास्त्रीय संगीत की महान विरासत को धारण करेंगे, तो यह बात सर्वाधिक विवेकपूर्ण व्यक्ति को भी बकवास ही लगती। लेकिन यह सही है क्योंकि इतिहास ने हमें सिखाया है कि हर नयी संगीत शैली किसी नये सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से नहीं पैदा हुई है और इसलिए किसी भौतिक क्रान्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करती है बल्कि सामग्री में परिवर्तन समाज में संगीत के समग्र कार्य में ऐतिहासिक रूप से आवश्यक परिवर्तन की शर्त है।

हमें मज़दूरों के संगीत आन्दोलन के आरम्भिक दौर में भी बार-बार दोहरायी जाने वाली इस प्रक्रिया को पहचानना होगा। केवल धुंधली सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि और द्वन्द्वात्मक रूप से अशिक्षित दिमाग वाले लोग ही संगीत के कार्य में परिवर्तन के इन छोटे-छोटे चिन्हों को पहचानने से चूक सकते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में वर्ग सचेत मज़दूरों की स्थिति को देखते हुए कार्य में यह परिवर्तन छोटा ही हो सकता था। जिस समय विज्ञान अभी सिर्फ प्रचार के काम में लगा हुआ था, जिस समय सामाजिक दबाव और बेरोकटोक पूँजीवाद व्यापक आबादी को मार्क्सवाद के लिए तैयार कर रहे थे, वैसे में इस बात को समझा जा सकता है कि मजदूरों की कला अभी प्रगतिशील विचारों को प्रतिबिम्बित करने में सक्षम नहीं थी। उस समय टेंडेंजकुंस्ट (Tendenzkünst) एक ऐसी कला थी जिसे वर्ग सचेत मज़दूर गैर वर्ग-सचेत मज़दूर के सामने प्रस्तुत करता था। इसका उद्देश्य दोनों को झकझोरना, वर्गीय मूल-भावनाओं को जगाना और उन्हें वर्ग संघर्ष में खींच लाना था। इसलिए संगीत और शब्दों को इस तरह का होना होता था जो गैर वर्ग-सचेत मज़दूर को तथा व्यक्ति की भावनाओं को अपील करे। यह नियोजित प्रचार कार्रवाई के पहले का कदम था।

1880 से 1914 के बीच के वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसी कृतियां मुखर साहित्य में आईं, सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यांकन के अनुसार जिनका आशय था बुर्जुआ वर्ग की पिछड़ी संगीत शैली को अपनाना। आज हम जानते हैं कि यह एक ऐतिहासिक सीमा थी क्योंकि बुर्जुआ वर्ग आधुनिक औद्योगिक सर्वहारा को जो शिक्षा उपलब्ध कराता है वह उसे सिर्फ शोषण के लिए अनुकूलित करती है और सर्वहारा को उस चीज़ से लैस नहीं करती जिसे बुर्जुआ कलाकार गहरा कला बोध कहते हैं। इसलिए गायकों और श्रोताओं दोनों को दी जाने वाली संगीत सामग्री काफी सरल ही हो सकती थी और इसका विन्यास ऐसा होना चाहिए था जो श्रोताओं में विशुद्ध भावनात्मक प्रभाव पैदा करे। मज़दूरों की इस विशुद्ध व्यावहारिक कलात्मक गतिविधि के साथ-साथ हमें एक और आकांक्षा का परीक्षण करना चाहिए।

यह राष्ट्रीय शिक्षा का पुराना विचार है जिसे संगीत के क्षेत्र में लागू करने का मतलब होगा सामन्तवाद और बुर्जुआ वर्ग के संगीत पर मज़दूरों द्वारा अधिकार कर लेना। शुरुआत से ही इसका नाकाम होना तय था क्योंकि मज़दूरों की आर्थिक स्थिति उनके लिए कला के प्रति बुर्जुआ वर्ग जैसा ही रुख अपनाना असम्भव बना देती है। यह हर सुधारवादी कार्रवाई की पुरानी गलती है जो फिर समझौते तक ले जाती है और जिसका अनिवार्य परिणाम होता है सौन्दर्यशास्त्र की दृष्टि से मूल्यवान सामग्री और राजनीतिक रूप से मूल्यवान सामग्री को आमने-सामने खड़ा कर देना। अनजाने ही सही, यह बुर्जुआ वर्ग को फायदा पहुँचाता है।

यह स्पष्ट है कि हमें इन सुधारवादी आकांक्षाओं से भी लड़ना होगा। लेकिन मज़दूरों को सिर्फ इसी से खतरा नहीं है। उन्हें कला के उस भोंडे निम्न पूँजीवादी दृष्टिकोण से भी खतरा है जो बुर्जुआ वर्ग के तबकों से मज़दूरों के बीच घुसपैठ करता है। हमें याद रखना चाहिए कि आपरेटा, हिट सांग, छद्म और असली लोक गीत समाज के सभी तबकों की बड़ी आबादी द्वारा सुने जाते हैं और यहाँ मज़दूरों के सामने उतना ही बड़ा खतरा है जितना कि संगीत में मौजूद वर्गदम्भ से है। शास्त्रीय संगीत की समझ और उसमें रुचि पैदा करना उचित है बशर्ते इसका इस्तेमाल हल्के मनोरंजन संगीत को खत्म करने के लिए किया जाये। मनोरंजन संगीत के मुकाबले शास्त्रीय संगीत के लाभ स्पष्ट हैं क्योंकि यह मेहनतकश वर्ग के श्रोताओं से सजग होकर सुनने की माँग करता है जबकि मनोरंजन संगीत ऐसी कोई माँग नहीं करता बल्कि आलसीपन और दिमाग को ढीला छोड़ देने का भाव पैदा करता है। बुर्जुआ संगीत की महान कृतियों की प्रस्तुति के द्वारा मज़दूर वर्ग के श्रोताओं पर इस खतरे को दूर करना जरूरी है। लेकिन अगर इसके परिणामस्वरूप मज़दूरों में टेंडेंजमुजिक (सर्वहारा संगीत) के प्रति नकारात्मक रवैया पैदा हो गया तो यह लाभ बेहद गम्भीर नुकसान में भी तब्दील हो सकता है।

मज़दूरों के संगीत आन्दोलन को राजनीतिक संघर्षों में सोच के स्तर तक उठाने के लिए यह ज़रूरी है कि बुर्जुआ संगीत गतिविधियों के रूपों की आलोचना की जाये और उनका अब गैर-आलोचनात्मक ढंग से कतई इस्तेमाल न किया जाये। साथ ही मज़दूरों की नयी सामाजिक स्थिति का भी विश्लेषण किया जाना चाहिए।

पुराने टेंडेंजमुजिक के सामने वर्ग-सचेत मज़दूर द्वारा गैर वर्ग-सचेत मज़दूर को अपने पक्ष में करने का कार्यभार था। लेकिन आज की राजनीतिक स्थिति भिन्न है। मज़दूरों की व्यापक आबादी के पास अपने संगठन हैं, ट्रेड यूनियनें, पार्टियाँ , सांस्कृतिक और खेल संगठन। ये संस्थाएँ सही क्रान्तिकारी अवस्थिति तय करने के लिए लगातार संघर्ष चला रही हैं। रणकौशल का सवाल मज़दूर वर्ग के लिए प्रासंगिक हो गया है। जब यह सवाल अनावश्यक हो जायेगा, यानी जब सही रणकौशल अपनाया जायेगा, तभी क्रान्ति विजयी होगी। टेंडेंजकुंस्ट, जो 1880 के मज़दूर संगीत आन्दोलन के दृष्टिकोण की यांत्रिक ढंग से नकल करता है, अपने बीच कुछ कलात्मक दृष्टि से प्रगतिशील तत्वों के बावजूद निरर्थक और प्रतिक्रान्तिकारी है। लम्बे दौर में यह प्रतिगामी सिद्ध होगा क्योंकि यह मज़दूर आन्दोलन के भीतर के तमाम अन्तरविरोधों की अनदेखी करता है। टेंडेंजमुजिक का काम यह नहीं हो सकता कि वह जुझारू मज़दूरों की भावनाओं को निरुद्देश्य ढंग से झकझोरता रहे। इससे स्थिति में कोई बदलाव नहीं आयेगा। इस तरह के संगीत का स्थान एक ऐसी क्रान्तिकारी कला को लेना चाहिए जिसका मुख्य चरित्र जुझारू और शिक्षात्मक हो। इसके लिए द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी चिन्तन पद्धति और पिछले अस्सी वर्षों में इसके परिणामों पर सोचना होगा, पिछले बीस वर्षों के क्रान्तिकारी अनुभव के बारे में सोचना होगा।

एक ऐसे समाज में, जहाँ व्यापक जनता वर्ग संघर्ष की आवश्यकता पर तो एक है लेकिन इसे कैसे चलाया जाये, किन तरीकों और साधनों से चलाया जाये, इस पर बंटी हुई है, पहली बार कला समाज का महान शिक्षक बन सकती है। कला को वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त और अनुभवों को ताकतवर और प्रभावशाली छवियों में चित्रित करना होगा। बुर्जुआ कला का मुख्य उद्देश्य आनन्द है। मज़दूर वर्ग अपने वर्गीय इतिहास के जटिलतम और कठिनतम दौरों में से एक से गुजर रहा है; इसकी अपनी कतारों में तमाम अन्तरविरोध हैं। फिर भी सत्ता पर कब्जा करने का वास्तविक कार्यभार इसके सामने है और इसने फिर से कला को अपना महान मित्र बनाया है। कला, जिसका कार्य बदल रहा है। आनन्द, जो मुख्य उद्देश्य था, अब एक उद्देश्य का साधन बन गया है। कला अब महज लोगों की सौन्दर्य की प्यास को नहीं बुझाती, बल्कि यह सौन्दर्य का प्रयोग व्यक्ति को शिक्षित करने के लिए करती है, मज़दूर वर्ग के विचारों और वर्ग संघर्ष की वास्तविक समस्याओं को बोधगम्य और प्राप्य बनाने के लिए करती है।

संगीत अब अपने सौन्दर्य से वेश्यावृत्ति नहीं कराता बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के गड्डमड्ड भावों में व्यवस्था और अनुशासन लाता है। हम देख सकते हैं कि कला के कार्य में एक नया और महान परिवर्तन आयेगा। वर्ग इतिहास की सबसे कठिन स्थिति में एक शिक्षक, एक शस्त्र के रूप में सामने लायी गयी कला उस सबको छोड़ चुकी है जिसे बुर्जुआ कलाकार “सुन्दर” कहता है। एक वर्गविहीन समाज में कला का नया कार्य उल्लेखनीय स्तर तक इसकी शुरुआत में ही निहित है।

मज़दूरों के संगीत आन्दोलनों में अमल में लायी जा रही नयी पद्धतियों पर मैं यही कहना चाहूँगा कि इसके लिए कोई तैयार नुस्खा नहीं दिया जा सकता। मज़दूरों के संगीत आन्दोलन में विशेषज्ञों का यह काम है कि वे क्रान्तिकारी कला के नये कार्यों में निहित भौतिक परिवर्तनों का परीक्षण करें। साथ ही मज़दूरों की व्यापक आबादी और उनके पदाधिकारियों को अपने विशेषज्ञों को बाध्य करना चाहिए कि वे यह विश्लेषण ज़रूर करें और इसके नतीजों को अमल में लागू करके उनका नियंत्रण तथा आलोचनात्मक परीक्षण करें।

निष्कर्ष के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ: समाजवाद का अर्थ है समाज में विवेक का प्रवेश। अगर हम- और हमसे मेरा मतलब है सर्वहारा के हिरावल, क्रान्तिकारी मज़दूर- वास्तव में सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं, इसके बारे में सिर्फ एक अस्पष्ट और दूरस्थ स्वप्न के रूप में बात नहीं करना चाहते, तो हमें एक ऐसी कला के व्यवहार को प्रचारित करना होगा जो अपनी नयी पद्धतियाँ क्रान्तिकारी मज़दूरों के रोजमर्रा के संघर्षों से लेती है। लेकिन इसे सिर्फ उनकी पीड़ाओं और चिन्ताओं को ही नहीं प्रतिबिम्बित करना चाहिए, जैसा कि सुधारवादी और “सामाजिक” कलाकार सोचते हें, बल्कि इसे जर्मनी के भूखे और गरीब लोगों की व्यापक आबादी द्वारा सत्ता पर अधिकार करने के सही तरीकों को स्पष्ट करना चाहिए। सत्तर साल पहले, जब जर्मन मज़दूर अभी फटेहाल सी स्थिति में और संस्कृति से च्युत था, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के क्लासिकीय लेखकों में से एक फ्रेडरिक एंगेल्स ने घोषणा की थी कि इन्हीं बदबख्त स्त्री-पुरुषों का वर्ग, जो आज बर्बर अवस्था में जी रहे हैं, एक दिन वह एकमात्र वर्ग होगा जो जर्मनी में क्लासिकी दर्शन की विरासत को धारण करने और आगे बढ़ाने के लिए सामने आयेगा। यह सुनकर उस समय के सभी प्रोफेसरों के हँसी के मारे पेट में बल पड़ गये थे। और मैं एंगेल्स की भविष्यवाणी को संगीत में लागू करता हूँ और यह मानता हूँ कि मज़दूर, यानी यहाँ डसेलडोर्फ में रूर के खदान मज़दूर, सोलिंगेन के धातु मज़दूर, हेक्स्ट के रसायन मज़दूर, यही वह एकमात्र वर्ग है जो हमारी आँखों के सामने हो रहे बुर्जुआ वर्ग की संगीत संस्कृति के क्षरण और पतन के बाद महान बुर्जुआ संगीत की विरासत को उत्कंठापूर्वक स्वीकार करेगा और आगे बढ़ायेगा। इसी वर्ग से समाजवाद की नयी संगीत संस्कृति के निर्माता सामने आयेंगे।

प्रगतिशील बुर्जुआ संगीतकारों से इतना  ही कहा जा सकता है कि संगीत की नयी पद्धतियाँ बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध क्रान्तिकारी मज़दूरों के रोजमर्रा के संघर्ष में ही उभरेंगी; और एक नयी संगीत संस्कृति तभी निर्मित होगी जब जर्मनी के मज़दूर सत्ता पर काबिज होंगे और समाजवाद का निर्माण करेंगे।

टिप्पणियाँ:

1- कार्ल काउत्स्की (1854-1938), जर्मन सामाजिक-जनवादियों के एक प्रमुख सिद्धान्तकार, बाद में मार्क्सवाद से दूर चले गये और सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के विचार को खारिज किया। लेनिन ने उनके प्रतिक्रान्तिकारी विचारों की विस्तृत आलोचना की है।

2- गेब्रॉचमुजिक Gebrauchsmusik(उपयोगी संगीत) – इस शब्द का प्रयोग 1920 के दशक में उस संगीत के लिए किया जाता था जो कंसर्ट में नहीं प्रस्तुत किया जाता था बल्कि खास कामों में उपयोग में आता था, जैसे थियेटर या फिल्म, सामाजिक अवसरों आदि के लिए।

3- हाइनरिख शेंकर (Heinrich Schenker) Neue Musikalische Theorien and Phantasien,

2nd vol., Vienna\ Liepzig, 1922

4- जर्मन स्टाट पार्टी (Deutsche Staatspartie) 1930 में जर्मन डेमोक्रेटिक पार्टी के महत्वपूर्ण हिस्सों और प्रतिक्रियावादी समूहों द्वारा गठित। 1932 के आम चुनाव में इसका लगभग सफाया हो गया।

5- जर्मन पीपुल्स पार्टी (Deutsche Valkspartie) बुर्जुआ पार्टी, 1918-1933 (भारी उद्योग एवं वित्त द्वारा समर्थित); 1920-21 और 1922-30 तक सरकारी पार्टी; प्रमुख नेता गुस्ताव स्त्रेसमैन

6- सेंटर पार्टी (Zentrum Party), 1871 में गठित मुख्य बुर्जुआ कैथोलिक पार्टी

7- स्पीलफ्रायड, स्पीलमुजिक (spielfreude, spielmusik),- ये शब्द 1920 एवं 30 के दशक के खास किस्म के संगीत के द्योतक हैं (हिण्डेमिथ, बटिंग आदि) जिसे आइसलर ज्यादा ही “प्रमुदित” और “यांत्रिक गति वाला” मानते थे।

8- फ्रिट्ज जोडी, (Fritz Jode), 1887-1970, जर्मनी में युवाओं के बीच बुर्जुआ संगीत आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि। उसने युवाओं के बीच लोक संगीत की परम्परा और प्रथाओं को जिन्दा रखने का मूल्यवान प्रयास किया लेकिन क्रान्तिकारी मजदूर वर्गीय संगीतकारों ने लोक संगीत पर उसके निम्न-पूँजीवादी दृष्टिकोण और उस समय के सामाजिक संघर्षों में उसकी गैर-भागीदारी के लिए उसकी आलोचना की।

9- लिओ केस्टेनबर्ग (Leo Kestenberg), 1882-1962, पियानोवादक और संगीत शिक्षक, प्रशा के संस्कृति मंत्रालय में 1919-32 तक संगीत सम्बन्धी मामलों के सलाहकार के रूप में काम किया; बुर्जुआ-जनवादी, सर्वतोमुखी संगीत शिक्षा के समर्थक; 1933 में देश छोड़ने के लिए बाध्य किये गये।

अनुवाद: सत्यम

  • नान्दीपाठ-3, अप्रैल-जून 2016

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