कला-संस्कृति, शिक्षा एवं अकादमिक जगत पर भगवा फासिस्टों का बर्बर हमला

कला-संस्कृति, शिक्षा एवं अकादमिक जगत पर भगवा फासिस्टों का बर्बर हमला

आनन्द सिंह

फासीवाद की यह विशेषता है कि जहाँ एक ओर वह मज़दूर आन्दोलन का बर्बर दमन करता है और नागरिक व जनवादी अधिकारों को छीनकर बुर्जुआ जनवादी स्पेस को ख़त्म करता जाता है वहीं दूसरी ओर वह संस्कृति के क्षेत्र को अपनी रणभूमि बनाकर अपनी अतार्किक, कूपमण्डूक और दकियानूसी संस्कृति का वर्चस्व कायम करता है और मिथकों को सहज बोध के रूप में स्थापित करने की कुटिल चाल रचता है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के एक साल के भीतर ही जिस तरीके से कला-संस्कृति, शिक्षा एवं अकादमिक संस्थानों में उच्च पदों पर रद्दोबदल करते हुए संघ परिवार से जुड़े लोगों को नियुक्त किया जा रहा है वह संस्कृति के क्षेत्र को भगवा रंग में रंगने की हिन्दुत्ववादी फासिस्टों की रणनीति की ओर स्पष्ट संकेत है।

पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एण्ड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) के गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन के पद पर बी ग्रेड, सी ग्रेड व अश्लील फिल्मों में बतौर नायक काम करने वाले और महाभारत धारावाहिक में युधिष्ठिर की भूमिका अदा करने वाले तथा टेलीविज़न पर ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, रक्षा-कवच यंत्र की मार्केटिंग करने वाले भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय सदस्य गजेन्द्र चौहान को नियुक्त किये जाने के बाद से एफटीआईआई के छात्रों की हड़ताल और देश के अलग-अलग हिस्सों में इस हड़ताल को मिले जबर्दस्त समर्थन की वजह से यह मुद्दा अब राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में भी आ गया है। लेकिन बात सिर्फ़ गजेन्द्र चौहान तक सीमित नहीं है। एफटीआईआई की गवर्निंग काउंसिल में गजेन्द्र चौहान के अलावा 5 अन्य सदस्यों – नरेन्द्र पाठक, अनघा घईसस, प्रांजल सैकिया, राहुल सोलापुरकर और शैलेश गुप्ता का सीधे-सीधे संघ परिवार से सम्बन्ध है। नरेन्द्र पाठक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की इन-हाउस पत्रिका के 14 साल तक सम्पादक रह चुके हैं, अनघा घईसस 21 वर्षों तक संघ के प्रचारक रह चुके हैं, प्रांजल सैकिया संघ के आनुषंगिक संगठन संस्कार भारती के पदाधिकारी हैं, राहुल सोलापुरकर भाजपा के सदस्य हैं और शैलेश गुप्ता ने पिछले साल लोकसभा चुनावों से पहले मोदी की एक घटिया प्रचारात्मक फिल्म ‘शपथ मोदी की’ बनायी थी। गवर्निंग काउंसिल में संघियों को घुसाने की मोदी सरकार की नीति के विरोध में उसके कुछ सदस्यों – सिनेमैटोग्राफर सन्तोष सिवान, अभिनेत्री पल्लवी जोशी और निर्देशक जानू बरुआ ने इस्तीफा दे दिया है। गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के पीछे संघ का हाथ है यह बात संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र में प्रकाशित एक लेख से स्पष्ट हो जाती है जिसमें गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति का खुलकर बचाव किया गया है और इस नियुक्ति का विरोध कर रहे लोगों को विचारधारा से प्रेरित बताया गया है।

एफटीआईआई में छात्रों की हड़ताल की वजह से यह मुद्दा भले ही अब सुर्खियों में आया हो लेकिन मोदी सरकार ने शिक्षा, संस्कृति और अकादमिक जगत के संस्थानों के भगवाकरण पिछले साल सत्तासीन होने के साथ ही शुरू कर दी थी। पिछले साल मई में भाजपा की भारी जीत के बाद शिमला स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ (आईआईएएस) के चेयरमैन गोपाल गाँधी ने इस्तीफा दे दिया था और उसके बाद मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बिना किसी प्रक्रिया का पालन करते हुए चन्द्रकला पाडिया को आईआईएएस का चेयरमैन बना दिया। ग़ौरतलब है कि चन्द्रकला पाडिया आईआईएएस जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के चेयरमैन पद पर नियुक्त होने की कोई योग्यता नहीं रखती हैं। उनकी नियुक्ति सिर्फ़ सत्तासीन पार्टी से क़रीबी की वजह से की गयी।

पिछले साल अक्टूबर में एनसीईआरटी की निदेशक परवीन सिंक्लेयर को उनके कार्यकाल पूरा होने के दो वर्ष पूर्व ही इस्तीफा देना पड़ा। ग़ौरतलब है कि परवीन सिंक्लेयर ने 2005 में नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क की शुरुआत करने में अहम भूमिका निभाने की सज़ा मिली क्योंकि उसमें उन्होंने पिछली एनडीए सरकार द्वारा एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग में रंगने की प्रक्रिया को उलट दिया था।

इतिहास का विकृतिकरण फासीवादियों के सबसे प्रमुख हथियारों में से एक होता है। पिछले साल जुलाई में भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (आईसीएचआर) के चेयरमैन के पद पर वाई सुदर्शन राव जैसे संघी की नियुक्ति को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए। ये महाशय संघ के एक आनुषंगिक संगठन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के आंध्र चैप्टर के प्रमुख भी हैं। वे खुले आम जाति प्रथा का महिमामंडन कर चुके हैं और महाभारत व रामायण की ऐतिहासिकता सिद्ध करने एवं इतिहास के पुर्नलेखन की अपनी महत्वकांक्षा को छिपाते नहीं हैं। राव के अलावा कुछ अन्य संघियों को भी आईसीएचआर के शीर्ष पदाधिकारियों के रूप में नियुक्त किया गया है जिनमें से कई तो ऐसे हैं जिनका इतिहास से कोई लेना-देना ही नहीं है। आईसीएचआर के विश्वविख्यात शोधपत्र ‘इंडियन हिस्टॉरिकल रिव्यू’ के सम्पादकीय बोर्ड में संघियों की तैनाती हो चुकी है और उसके सलाहकार बोर्ड से रोमिला थापर, इरफान हबीब और मुशीरुल हक़ जैसे प्रख्यात इतिहासकारों को हटा दिया गया है। इसी तरह से भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद (आईसीसीआर) के प्रमुख के पद पर 87 वर्षीय लोकेश चन्द्रा को नियुक्त किया गया है जिन्होंने मोदी भक्ति का नमूना देते हुए हाल ही में यह बयान दिया है कि मोदी गाँधी से भी बड़े नेता हैं। इसके अलावा इस साल मार्च में संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ के पूर्व सम्पादक बलदेव शर्मा को नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन के पद पर बैठाया गया है।

पहलाज़ निहलानी को मोदी के चुनाव प्रचार का वीडियो “हर-हर मोदी, घर-घर मोदी” बनाने के पुरस्कार के रूप में को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन, यानी सेंसर बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया है। इसी तरह से चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी का चेयरमैन महाभारत में भीष्म पितामह और कॉमिक सीरियल शक्तिमान में मुख्य रोल करने वाले मुकेश खन्ना को बनाया गया है। प्रसार भारती का चेयरमैन सूर्यप्रकाश को बनाया गया है जो भाजपा की ओर पूरी तरह झुकाव रखने वाले अख़बार पॉयनियर के सम्पादक रह चुके हैं और संघ के थिंक टैंक विवेकानन्द इंटरनेशनल फाउंण्डेशन से जुडे़ हैं। यही नहीं सेंसर बोर्ड के कोलकाता के सलाहकार मण्डल में भी ऐसे संघियों को भरने की ख़बर सुर्खियों में है जिनका फिल्मों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। नवनियुक्त सदस्यों में जब एक से पूछा गया कि आपकी योग्यता क्या है तो उसने बेहद हास्यास्पद जवाब देते हुए कहा कि कि उसे फिल्मों का बहुत शौक है और उसके घर में 500 फिल्मों की बहुत बड़ी लाइब्रेरी है।

कला ही नहीं विज्ञान एवं प्रबंधन के प्रतिष्ठित संस्थानों के भगवाकरण की कोशिशें मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल में साफ़ देखी जा सकती हैं। इसी तरह से इस साल मार्च में प्रख्यात नाभिकीय वैज्ञानिक अनिल काकोदकर को रोपड़, भुवनेश्वर और पटना के आईआईटी में निदेशक के पद के चुनाव को लेकर मानव संसाधन मंत्री से हुए मतभेद के चलते आईआईटी बॉम्बे की गवर्निंग बॉडी से अपने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ा। इसी तरह नागपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज एनआईटी में संघ के प्रचारक को नियुक्त किया गया है। संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र में एक हालिया लेख में आईआईटी एवं आईआईएम को “हिन्दू-विरोधी” एवं “भारत-विरोधी” गतिविधियों का अड्डा बताया गया है और यह कहा गया है कि इन संस्थानों में “ओछी नैतिकता वाले” “कांग्रेसी” व “वामपंथी” अध्यापकों का दबदबा है जो वहाँ के छात्रों को बिगाड़ते हैं। संघ का इशारा साफ़ है कि आने वाले दिनों में इन संस्थानों में “हिन्दू नैतिकता” वाले संघियों को भरा जायेगा ताकि छात्रों में भक्तिभाव के अलावा और कोई भाव न आने पाये।

मोदी सरकार संसद से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बिल पास कराने की फ़िराक में है जिसके बाद आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों के संचालन और उनके शीर्ष पदाधिकारियों की नियुक्तियों में सरकार की दख़लन्दाजी पहले से कहीं अधिक बढ़ जायेगी।

इसके अलावा कई विश्वविद्यालय के कुलपतियों की नियुक्ति में संघ परिवार से जुड़े लोगों को वरीयता दी जा रही है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गिरीश चन्द्र त्रिपाठी और भोपाल के माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति बीके कुठियाला के संघ के रिश्ते जगजाहिर हैं। अमर्त्य सेन को नालन्दा विश्वद्यिालय के चांसलर पद से पहले ही हाथ धोना पड़ा है। अपने इस्तीफे के वक़्त सेन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मोदी सरकार के आने के बाद भारत में अकादमिक स्वतंत्रता पर बहुत जबर्दस्त खतरा मंडरा रहा है। आने वाले दिनों में भाजपा शासित राज्यों एवं केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के भगवाकरण की प्रक्रिया और ज़ोर पकड़ेगी।

कला, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, शिक्षा, सिनेमा आदि से जुड़े संस्थानों में बड़े पैमाने पर संघ परिवार से जुड़े लोगों की ये नियुक्तियाँ यह बता रही हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के काल में मुरली मनोहर जोशी की अगुवाई में जो भगवाकरण किया गया था उसके मुकाबले इस बार कहीं ज़्यादा योजनाबद्ध तरीके से भगवाकरण को अंजाम दिया जा रहा है।

जैसा कि ब्रेष्ट ने कहा था कि फासीवाद का मुक़ाबला सिर्फ़ मानवतावादी गुहारों के ज़रिये लोगों के दिलो-दिमाग में दख़ल करने के सौन्दर्यशास्त्रीय तरीके से नहीं किया जा सकता। फासीवाद के खि़लाफ़ एक जुझारू सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करने के लिए कला और संस्कृति के मोर्चे को कहीं अधिक गम्भीरता से लेने की ज़रूरत है। कुलीनतावादी, अकर्मक, सांकेतिक, अनुष्ठानधर्मी, पैसिव एवं रक्षात्मक तरीकों से फासीवाद का मुक़ाबला कतई नहीं किया जा सकता।

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