‘नान्दीपाठ’ आपके बीच क्यों?

‘नान्दीपाठ’ का प्रवेशांक आपके हाथों में है। इस मौके का उपयोग हम इस पत्रिका के उद्देश्यों को स्पष्ट करना चाहेंगे। जैसा कि पत्रिका का नाम ‘नान्दीपाठ समाज, संस्कृति और मीडिया’ से स्पष्ट है, इस पत्रिका में हमारा उद्देश्य होगा सांस्कृतिक परिघटनाओं का आलोचनात्मक विश्लेषण। समाज में होने वाली इन सांस्कृतिक परिघटनाओं के प्रमुख उपकरण का काम आज मीडिया करता है। बीसवीं सदी में मीडिया शासक वर्ग के वर्चस्व को निर्मित करने के सबसे अहम उपकरण के रूप में उभरा है। यही कारण है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही मार्क्सवादी चिन्तन के दायरों के भीतर तमाम ऐसी रुझानें पैदा हुईं ज़िन्होंने सांस्कृतिक आलोचना, विश्लेषण और विशेष तौर पर मीडिया, सिनेमा और संगीत के अध्ययन पर विशेष ज़ोर दिया है और उसे अपने प्रमुख कार्यभार के रूप में अपनाया है।
बीसवीं सदी के इतिहास ने दिखलाया है कि मास मीडिया ने शासक वर्गों की अपने विचारधारात्मक और सांस्कृतिक वर्चस्व को विस्तारित, सुदृढ़ और गहरा करने में विशेष रूप से सहायता की है। मास मीडिया आज समाज के सांस्कृतिक दायरे को काफी हद तक निर्धारित करता है। इस काम को वह उन सूचनाओं और सांस्कृतिक रूपों के ज़रिये करता है जो वह जनता के बीच पेश करता है। टेलीविज़न के उदय और प्रसार के साथ, इन सूचनाओं और सांस्कृतिक रूपों की पहुँच 1960 के दशक से और विशेष रूप से 1980 के दशक से घर-घर तक हो चुकी है। ये सूचनाएँ और सांस्कृतिक रूप उस बौद्धिक वर्ग द्वारा निर्मित किये जाते हैं, जो कि शासक वर्गों के वर्चस्व के मातहत होते हैं, चाहें वे इसके बारे में सचेत हों या नहीं। पत्रकारों और लगभग सभी प्रकार के कलाकारों के समाजीकरण, शिक्षण और प्रशिक्षण की पूरी प्रक्रिया ही इस प्रकार की होती है कि वे शासक वर्गों के विचारों के प्रभाव में होते हैं, और अक्सर वे अपने आपको निष्पक्ष और स्वतन्त्र समझने के भ्रम में जी रहे होते हैं। साथ ही, ज़िन मीडिया संस्थानों में ये पत्रकार या कलाकार स्थायी या अस्थायी रूप से कार्यरत होते हैं उनके मालिकाने और प्रबन्धन का स्वरूप भी एक हद तक यह तय कर देता है कि वे ज़िस सांस्कृतिक उत्पाद के निर्माण में लगे हैं, उनका स्वरूप कैसा होगा।

शासक वर्गों के वर्चस्व के निर्माण, पुनरुत्पादन, सुदृढ़ीकरण और विस्तार के प्रमुख उपकरण के रूप में मीडिया की भूमिका के बारे में पिछली सदी में ही मार्क्सवादी बौद्धिक परम्परा के दायरों के भीतर काफी काम हुआ है, और अभी भी यह काम जारी है। जनता के बीच मीडिया पर भरोसा करने की एक प्रवृत्ति होती है; दूसरे शब्दों में कहा जाय तो मीडिया की एक साख होती है। ऐसा इसलिए होता है कि मीडिया की छवि एक गैर-पक्षधर संस्था के रूप में स्थापित की जाती है। मीडिया को लोकतन्त्र के “चौथे खम्भे” के रूप में प्रचारित किया जाता है और ऐसा प्रदर्शित किया जाता है कि वह बाकी तीनों खम्भों से स्वायत्त है और उनकी “अन्तरात्मा की आवाज़” और व्यवस्था के अतिरेकों के प्रति एक प्रति-सन्तुलन की प्रणाली के रूप में काम करता है। लेकिन अगर मीडिया की पूरी कार्यप्रणाली, ख़बरों और मनोरंजन के कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण की पूरी प्रक्रिया पर निगाह दौड़ायी जाय तो साफ़ हो जाता है कि मीडिया की निष्पक्षता और स्वतन्त्रता एक मिथक है। वास्तव में, मीडिया की वर्चस्वकारी प्रणाली की सबसे मज़ेदार बात यह है कि मीडिया स्वयं अब इस सच्चाई को अपने कार्यक्रमों और फिल्मों के ज़रिये दिखला रहा है और इस रूप में वह अपनी स्वतन्त्रता, स्वायत्तता और निष्पक्षता की छवि को एक बार फिर से स्थापित कर रहा है। ऐसे में, पैसे देकर ख़बरें ख़रीदना, शासक वर्गों की सेवा करना और मीडिया में व्याप्त विभिन्न प्रकार का भ्रष्टाचार मीडिया जगत का नियम या प्रवृत्ति नहीं बल्कि उसका एक विच्युति या विचलन बन जाता है। मीडिया अपनी इस पूरी कार्यप्रणाली से वास्तव में जो काम करता है वह है समाज में लोगों को एक व्याख्यात्मक ढाँचा प्रदान करना ज़िससे कि वे दुनिया को देख सकें और व्याख्यायित कर सकें, यानी उन्हें अर्थों की एक पूरी व्यवस्था प्रदान करना। जनता के पास पहले से कोई व्याख्यात्मक ढाँचा या अर्थों की कोई व्यवस्था बने-बनाये रूप में मौजूद नहीं होती और विशेष तौर पर जनता के मेहनतकश और निम्न मध्यवर्गीय हिस्सों का जीवन उन्हें तमाम परिघटनाओं को देखने की आलोचनात्मक दृष्टि तैयार करने की इजाज़त नहीं देता। ऐसे में, शासक वर्ग अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए उन्हें अपने नज़रिये से दुनिया को देखने की आदत डलवाते हैं। मीडिया आज के युग में इस काम में शासक वर्गों का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

अगर शासक वर्गों के विरुद्ध जनता को जागृत, गोलबन्द और संगठित होने में सक्षम बनाना है तो ठोस भौतिक, आर्थिक और सामाज़िक मुद्दों पर आन्दोलनों के साथ-साथ मीडिया द्वारा स्थापित किये जाने वाले शासक वर्गों के वर्चस्व में दरारें पैदा करना ज़रूरी है। निश्चित रूप से, शासक वर्गों के विचारों के प्रभाव को मौजूदा व्यवस्था के दायरे के भीतर ख़त्म नहीं किया जा सकता है। ऐसा करने के लिए तो क्रान्ति के बाद भी कई सांस्कृतिक क्रान्तियाँ करनी पड़ती हैं और कई बार क्रान्तिकारी शिक्षा आन्दोलन चलाने पड़ते हैं। लेकिन क्रान्ति हो सके इसके लिए शासक वर्गों के वर्चस्व की इमारत में कुछ दरारें पैदा करना ज़रूरी है; प्रति-वर्चस्व की संरचनाएँ खड़ी करना ज़रूरी है, अन्यथा क्रान्ति को सम्भव बनाने वाली, उसे संगठित करने और नेतृत्व देने वाली उन्नत हिरावल ताक़तें ही कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएँगी।

शासक वर्ग के वर्चस्व के समक्ष प्रति-वर्चस्व की संस्थाएँ, उपकरण और प्रयोग निर्मित करना आज के दौर का एक प्रमुख कार्यभार है। ‘नान्दीपाठ’ इस कार्यभार को हाथ में लेने के लिए प्रतिबद्ध है। मार्क्स ने बताया था कि हर युग के शासक विचार शासक वर्गों के विचार होते हैं क्योंकि ज़िन वर्गों के पास भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं उन्हीं के पास बौद्धिक उत्पादन के साधन भी होते हैं। लेकिन ज़िस प्रकार से शासक वर्ग भौतिक उत्पादन के साधनों स्वामी होने के कारण भौतिक रूप से अप्रतिरोध्य और अपराजेय नहीं हैं, उसी प्रकार सांस्कृतिक-बौद्धिक उत्पादन के साधनों के स्वामी होने के कारण शासक वर्ग सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से भी अप्रतिरोध्य या अपराजेय नहीं हैं। समाज में उनके वर्चस्व का निशाना मेहनतकश वर्ग तो होते ही हैं, ज़िन्हें वे सबसे घटिया सांस्कृतिक उत्पाद नशे की खुराक के तौर पर देते रहते हैं, लेकिन शासक वर्गों के सबसे उन्नत सांस्कृतिक उत्पादों का सबसे प्रमुख निशाना होते हैं समाज के मध्यमवर्गीय और निम्न-मध्यमवर्गीय बौद्धिक तबके और विशेष तौर पर युवा बौद्धिक। इन्हें निशाना बनाते हुए तमाम सांस्कृतिक उत्पाद रचे जाते हैं, क्योंकि शासक वर्ग भी इस बात से वाक़िफ है कि इनमें से जनता का पक्ष चुनने वाले बुद्धिजीवियों का पैदा होना ख़तरनाक होगा। इसीलिए वे क्रान्ति के बौद्धिक भर्ती केन्द्रों को ही बेकार और बंजर बना देना चाहते हैं। इसके लिए शासक वर्ग आज मीडिया और सिनेमा का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहा है और उनके बीच अपने वर्चस्व को स्थापित कर रहा है। हमें उनके इस प्रयास के बरक्स अपने विचारों के वर्चस्व को स्थापित करने वाली संरचनाएँ, संस्थाएँ और बौद्धिक उपक्रम खड़े करने होंगे। ये उपक्रम आकार में कारपोरेट मीडिया ज़ितने दैत्याकार हों, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन जनता की ताक़तों के बल पर समानान्तर फिल्में, नाटक, संगीत और पत्र-पत्रिकाएँ खड़ा करना वह काम कर देगा जो वांछित और अभीष्ट है। यह काम है शासक वर्गों द्वारा दिये जा रहे व्याख्यात्मक चौखटे के बरक्स एक सही, तार्किक और वैज्ञानिक व्याख्यात्मक चौखटा और अर्थों की पूरी व्यवस्था समाज के उन्नत तत्वों को मुहैया कराना। इसके लिए, कारपोरेट मीडिया ज़ितने आकार की ज़रूरत नहीं है, बल्कि प्रतिबद्ध सांस्कृतिक-बौद्धिक कार्यकर्ताओं, हमदर्दों और शुभचिन्तकों की टीमों की ज़रूरत है। ‘नान्दीपाठ’ अगर इस व्यापक उद्देश्य के एक छोटे.से हिस्से को अंजाम दे पाता है, तो सफल और सार्थक होगा।
‘नान्दीपाठ’ का उद्देश्य है कि शासक वर्ग द्वारा अपने वर्चस्व को स्थापित करने के इस प्रयास के बरक्स प्रति-वर्चस्व का एक मॉडल खड़ा किया जाय। इसके लिए हम ‘नान्दीपाठ’ में सिनेमा, नाटक, टेलीविज़न कार्यक्रमों, संगीत आदि की क्रान्तिकारी मार्क्सवादी अवस्थिति से समीक्षा और आलोचना पेश करेंगे; इसके अतिरिक्त, हम मार्क्सवादी सांस्कृतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में विवाद के प्रमुख मुद्दों पर गम्भीर सैद्धान्तिक सामग्री देंगे; हमारा प्रयास होगा कि हम इस क्षेत्र मं चली प्रमुख बहसों से हिन्दी जगत के पाठकों को अवगत करायें; साथ ही, हम मार्क्सवादी सांस्कृतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में आने वाली नयी रचनाओं की समीक्षा भी पेश करेंगे। इस अंक में हम मार्टिन स्कॉर्सेज़ी की प्रसिद्ध फिल्म ‘शटर आईलैण्ड’ की समीक्षा दे रहे हैं; बच्चों के बीच मीडिया किस प्रकार साम्राज्यवाद के एजेण्डे को आगे बढ़ाता है, इस पर हाली ओज़गुनर व दुइगू चुकूर का एक लेख दिया जा रहा है; इसके अतिरिक्त, मार्क्सवादी मीडिया सिद्धान्त का आलोचनात्मक सर्वेक्षण करने वाला एक लेख भी हम इस अंक में दे रहे हैं; मार्क्सवादी सांस्कृतिक सिद्धान्त के दो दिग्गजों के लेख भी इस अंक में हम दे रहे हैं, अडोर्नो का लेख ‘ख़ाली समय’ और साथ ही, वॉल्टर बेंजामिन का प्रसिद्ध लेख ‘यान्त्रिक पुनरुत्पादन के युग में कलात्मक रचना’।

हम उम्मीद करते हैं कि प्रवेशांक की सामग्री से हम ‘नान्दीपाठ’ के पूरे प्रोजेक्ट का स्वर निर्धारित करने और पाठकों के बीच अपने उद्देश्यों को सम्प्रेषित करने में सफल होंगे। हम यह भी उम्मीद करते हैं कि हम जो उद्देश्य अपने लिए तय कर रहे हैं, उसके मद्देनज़र पहले अंक की सामग्री कसौटी पर खरी उतरेगी। और अन्त में, हम यह आशा करते हैं कि इन मुद्दों पर गम्भीरता से चिन्तन-मनन करने वाले सभी सुधी पाठकों का सहयोग हमें भविष्य में प्राप्त होगा।

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