पूँजीवाद का संकट और ‘सुपर हीरो’ व ‘एंग्री यंग मैन’ की वापसी (दूसरी क़िस्त)

पूँजीवादी आर्थिक व राजनीतिक संकट के दौर में पलायनवादी कल्पनाओं के रूप में और वास्तविक समस्याओं के फैण्टास्टिक समाधान प्रस्तुत कर यथार्थ में अनुपस्थित मूल्यों व अभाव (lack) की एक प्रतिगामी पूर्ति कर सुपरहीरो फिल्में समूची पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था की सेवा करती हैं और जनता की पहलकदमी की भावना (वह जिस मात्रा में भी हो या सम्भावना के रूप में हो) को ख़त्म करने और उस पर चोट करने का काम करती हैं। इनमें बैटमैन त्रयी जैसी फिल्में इस कार्य को कई स्तरों पर व्यवस्था के लिए वैधीकरण तैयार करते हुए करती हैं। ये फिल्में छद्म विकल्पों का द्वन्द्व पेश कर जनता के समक्ष एक विकल्पहीनता की स्थिति के पक्ष में राय बनाती हैं और यह यक़ीन दिलाने का प्रयास करती हैं कि जो है वह सन्तोषजनक नहीं है, लेकिन यही वह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है, जिसकी हम उम्मीद कर सकते हैं। read more

क्या हमारे देश के जनपक्षधर संस्कृतिकर्मी आसन्न युद्ध के लिए तैयार हैं?

यह कार्य करने के लिए हज़ारों प्रतिबद्ध प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों की आवश्यकता होगी जो कि युद्धस्तर पर और ज़मीनी तौर पर जनता के बीच फासीवादी राजनीति, संस्कृति, मूल्यों और विचारधारा को नंगा करते हुए उसे निष्प्रभावी बना सकें। यह क्रान्तिकारी आन्दोलन फासीवाद को वहाँ चोट पहुँचा सकता है, जहाँ इसे सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ होती है। भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, देशभक्ति पर इनके दावों को पूरी तरह से ख़ारिज किया जा सकता है। जनता के बीच जनता की भाषा और जनता के सांस्कृतिक माध्यमों के ज़रिये इनकी पूरी जन्मकुण्डली को खोलना और इनके रहस्यवाद की सच्चाई को उजागर करना आज की बुनियादी ज़रूरत है। read more

हमारी बात

रचनात्मक साहित्य में आम तौर पर हिन्दुत्ववादी कट्टरपन्थियों का विरोध प्रायः ‘सर्वधर्म सम्भाव’ की ज़मीन से या बुर्जुआ मानवतावाद या बुर्जुआ जनवाद की ज़मीन से करने की प्रवृत्तियाँ दिखायी देती हैं। यह निरर्थक और घातक है। हमें “उदार हिन्दू” या “रैडिकल हिन्दू” का रुख अपनाने के बजाय धर्म के जन्म और इतिहास की भौतिकवादी समझ का प्रचार करना होगा, धर्म के प्रति सही सर्वहारा नज़रिये को स्पष्ट करना होगा, धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच के फ़र्क को स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक परिघटना के रूप में साम्प्रदायिकता की समझ बनानी होगी तथा संकटग्रस्त पूँजीवाद की विचारधारा और राजनीति के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार का विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। read more

संस्कृति, मीडिया और विचारधारात्मक प्रभाव

सर्वसहमति का निर्माण करना निश्चित रूप से एक जटिल कार्य है और इस कार्य को सम्पादित करना ही मीडिया का लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य की प्रापित के लिए उसे कुछ व्याख्याओं को शामिल करना पड़ता है और कुछ को खारिज। शामिल की जाने वाली व्याख्याओं में ऐसी होती हैं जो कुल मिलाकर विवादरहित होती हैं। इसके विपरीत जिन व्याख्याओं में कुछ विवाद होता है उन्हें खारिज कर दिया जाता है। खारिज की जाने वाली व्याख्याओं के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है वे इस प्रकार के हैं, ‘अतिवादी, ‘अविचारपूर्ण, ‘निरर्थक, ‘काल्पनिक, ‘अव्यावहारिक, आदि read more

पूँजीवाद का संकट और ‘सुपर हीरो’ व ‘एंग्री यंग मैन’ की वापसी (पहली किश्त)

‘एंग्री यंग मैन’ के पुराने संस्करण से नये संस्करण में आये पतन को तभी समझा जा सकता है जब इसे पूँजीवादी समाज, संस्कृति, राजनीति और अर्थव्यवस्था की पतनशीलता के प्रतिबिम्बन के रूप में देखा जाये। भारतीय सिनेमा में प्रकट हुआ नया ‘एंग्री यंग मैन’ पतनशील, मरणोन्मुख और अश्लील पूँजीवाद के अन्तकारी संकट की पैदावार है; यह अपने पर हँस रहा है और हमें भी हँसने को कह रहा है। यह अपने पूरे वजूद के पीछे खड़े संकट के प्रति सचेत है और अपने पूरे वजूद के अवास्तविक होने का पहचानता है। read more

समकालीन पूँजीवादी समाज में अपराध : कुछ फ़ुटकल नोट्स

किसी भी ह्रासमान समाज-व्यवस्था की सांस्कृतिक पतनशीलता और आत्मिक रिक्तता लगातार बढ़ती चली जाती है। आज का असाध्य ढाँचागत संकटग्रस्त वृद्ध पूँजीवाद की संस्कृति घोर मानवद्रोही और आत्मिक रूप से कंगाल है। सामाजिक ताने-बाने से जनवाद के रहे-सहे तत्व भी तिरोहित हो रहे हैं। अलगाव व्यक्तियों को विघटित कर रहा है। आश्चर्य नहीं कि स्वीडन जैसा कल्याणकारी राज्य वाला समृद्ध देश यौन अपराधों के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है। read more

अमीरी बराका : काली अमेरिकी रैडिकल चेतना के एक सबसे मुखर प्रवक्ता का जाना

पिछली 9 जनवरी को अमीरी बराका के निधन के साथ ही वह आवाज़ हमेशा के लिए शान्त हो गयी जो अमेरिका में काले लोगों की चेतना को रैडिकलाइज़ करने में सबसे अहम योगदान करने वालों में शामिल थी। पाल लारेंस डनबर, लैंग्सटन ह्यूज, ज़ोरा वीले हर्स्टन, रिचर्ड राइट, फ्रेडरिक डगलस, फ़िलिस व्हीटले जैसे लेखकों की श्रंखला में बराका शायद आखिरी बड़ा नाम थे। बराका अपने विचारों और शैली की उग्रता के कारण अक्सर विवादास्पद रहे लेकिन वे हमेशा जनता और न्याय के पक्ष में खड़े रहे। उनकी विचारयात्रा में कर्इ उतार-चढ़ाव आये लेकिन वे कभी हताश या जनविमुख नहीं हुए। read more

पीट सीगर (1919-2014): जनता की आवाज़ का एक बेमिसाल नुमाइन्दा

27 जनवरी 2014 के दिन पीट सीगर की मृत्यु के साथ प्रतिरोध संगीत का एक युग ख़त्म हो गया। पीट सीगर ने प्रतिरोध व प्रगतिशील संगीतज्ञों और साथ ही पश्चिमी लोक संगीतज्ञों की कर्इ पीढ़ियों का पालन-पोषण अपने हाथों से किया था। इन संगीतज्ञों में बाब डिलन, डान मैक्लीन, बर्नीस जानसन रीगन, आदि प्रमुख थे। 3 मर्इ 1919 को जन्मे पीट सीगर का 94 वर्ष का जीवन जनता को समर्पित था। सीगर का जन्म संगीतज्ञों के एक परिवार में हुआ था। उनके पिता चार्ल्स सीगर एक संगीत विशेषज्ञ थे जबकि माँ कांस्टैंस आर्केस्ट्रा में वायलिन वादक थीं। पीट जब छोटे थे तभी पिता ने उनका परिचय लोक संगीत से करा दिया था। माँ और पिता अक्सर ही उन्हें संगीत कंसर्टों और लोक संगीत समारोहों में लेकर जाते थे। read more

राज्य के साथ कला का संघर्ष लेखक तथा उत्तर-औपनिवेशिक समाज के संरक्षक

इतिहास की दृष्टि से मानव जीवन में कला का जन्म राज्य के उद्भव से पहले हुआ था। राज्य के प्रारम्भिक स्वरूप में उभरने से भी पहले लोग अपने शरीर को सजाते थे, पत्थरों पर चित्र बनाते थे, गीत गाते थे और नृत्य करते थे। राज्य का जो मौजूदा स्वरूप है वह हमेशा से नहीं है। जैसा कि एंगेल्स ने अपनी किताब ‘परिवार और राज्यसत्ता की उत्पत्ति*’ में लिखा है यह परस्पर विरोधी सामाजिक संवर्गों में मानव समाज के विकास का नतीजा है। संघर्षशील सामाजिक हितों से ऊपर एक सत्ता उभरती है जो तटस्थ नज़र आती है। दमनकारी उपकरणों और संस्थाओं से लैस यह सत्ता पूरे समाज को वैसे ही नियंत्रित करती है जैसे सामन्ती युग में कोर्इ पितृसत्तात्मक व्यक्ति अपने कुनबे को करता था। read more